Middle East War: पश्चिम एशिया में भटक रहे यात्री विमान, GPS स्पूफिंग से बढ़ी पायलटों की मुश्किल

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Middle East War: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच अब इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर का असर नागरिक उड्डयन पर भी दिखाई देने लगा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस क्षेत्र से गुजरने वाले कई यात्री विमान जीपीएस और जीएनएसएस सिग्नलों में गड़बड़ी की वजह से गलत दिशा की जानकारी प्राप्त कर रहे हैं।

विमान अपनी सटीक लोकेशन, गति और ऊंचाई का पता लगाने के लिए ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) और ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) पर निर्भर रहते हैं। लेकिन जब इन सिग्नलों के साथ छेड़छाड़ की जाती है, तो पायलट को विमान की स्थिति के बारे में गलत जानकारी मिल सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी स्थिति उड़ान संचालन के लिए बेहद संवेदनशील हो सकती है।

झूठे सिग्नलों से भटक रहे विमान

मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष के दौरान कुछ क्षेत्रों में जीपीएस स्पूफिंग की घटनाएं सामने आई हैं। इसमें विमान के नेविगेशन सिस्टम को झूठे सिग्नल भेजे जाते हैं, जिससे विमान की वास्तविक लोकेशन की जगह किसी दूसरी जगह का डेटा दिखाई देता है।

प्रभावित विमानों द्वारा एडीएस-बी (Automatic Dependent Surveillance-Broadcast) सिस्टम के जरिए भेजी गई लोकेशन को जब फ्लाइट ट्रैकिंग मैप पर देखा जाता है, तो कई बार विमान का रास्ता असामान्य दिखाई देता है। ऐसा लगता है कि विमान उन जगहों से गुजर रहा है, जहां वह वास्तव में गया ही नहीं।

हालांकि इस तरह की गड़बड़ी के बावजूद पायलट मैनुअल और वैकल्पिक सिस्टम की मदद से विमान को सुरक्षित तरीके से संचालित करते रहते हैं।

सिग्नल जैमिंग और स्पूफिंग क्या है?

सिग्नल जैमिंग और स्पूफिंग दो अलग-अलग तकनीकें हैं, जिनका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर में किया जाता है।

सिग्नल जैमिंग तब होती है जब जीपीएस सिग्नल को कमजोर करने के लिए शक्तिशाली रेडियो सिग्नल प्रसारित किए जाते हैं, जिससे असली सिग्नल दब जाते हैं और सिस्टम उन्हें सही तरीके से पकड़ नहीं पाता।

वहीं सिग्नल स्पूफिंग में हमलावर जीपीएस या जीएनएसएस की ही फ्रीक्वेंसी पर नकली सिग्नल भेजता है। इससे विमान के सिस्टम को लगता है कि यह असली सिग्नल है और वह उसी के आधार पर गलत लोकेशन दिखाने लगता है।

फ्लाइट सेफ्टी पर कितना असर?

विशेषज्ञों के अनुसार जीपीएस सिग्नल में गड़बड़ी से पायलट को नेविगेशन से जुड़ी चुनौतियां जरूर आती हैं, लेकिन इससे उड़ान पूरी तरह असुरक्षित नहीं हो जाती। आधुनिक विमानों में कई बैकअप सिस्टम मौजूद होते हैं।

जब सैटेलाइट सिग्नल उपलब्ध नहीं होते या गलत जानकारी मिलती है, तब पायलट इनर्शियल रेफरेंस सिस्टम (IRS) का सहारा लेते हैं। यह सिस्टम जाइरोस्कोप और एक्सेलेरोमीटर की मदद से विमान की दिशा, गति और स्थिति की गणना करता है।

फ्लाइट ट्रैकिंग सेवा फ्लाइटराडार24 को दिए एक इंटरव्यू में एक पायलट ने बताया कि सिग्नल गड़बड़ी के दौरान सिस्टम कभी-कभी गलत जानकारी दिखा सकता है, जैसे विमान पहाड़ों के ऊपर उड़ रहा है या विमान की घड़ी गलत समय दिखा रही है। ऐसे समय में पायलट को अपने अनुभव और बैकअप सिस्टम पर भरोसा करना पड़ता है।

लैंडिंग के समय बढ़ जाती है चुनौती

विशेषज्ञों का कहना है कि उड़ान के दौरान तो पायलट वैकल्पिक सिस्टम के जरिए स्थिति संभाल लेते हैं, लेकिन लैंडिंग के समय सटीक नेविगेशन की जरूरत ज्यादा होती है। ऐसे में जीपीएस सिग्नल में गड़बड़ी बड़ी चुनौती बन सकती है।

संघर्ष वाले क्षेत्रों में इस तरह की घटनाएं पहले भी देखी जा चुकी हैं। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भी कई क्षेत्रों में जीपीएस सिग्नल में बाधा की घटनाएं सामने आई थीं।

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