Calcutta High Court Election Commission मामले में पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा उपचुनाव से पहले चुनाव चिह्न को लेकर विवाद सामने आया है। भारतीय सेक्युलर फ्रंट (ISF) की याचिका पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा कि 2026 के विधानसभा चुनाव में ISF द्वारा इस्तेमाल किए गए ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न को उपचुनाव में दूसरी पार्टी को क्यों आवंटित किया गया।
जस्टिस कृष्णा राव की पीठ ने सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर कड़े मौखिक सवाल किए। रिपोर्टों के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि चुनाव अधिकारियों को निष्पक्ष और उचित तरीके से काम करना चाहिए तथा यह भी सवाल उठाया कि उपलब्ध कई अन्य चुनाव चिह्नों में से इसी चिह्न को क्यों चुना गया।
183 चुनाव चिह्न उपलब्ध होने पर कोर्ट ने पूछा सवाल

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने चुनाव आयोग के वकील से पूछा कि जब आयोग के पास 183 मुक्त चुनाव चिह्न उपलब्ध थे, तो ISF द्वारा हाल ही में इस्तेमाल किए गए ‘लिफाफा’ चिह्न को ही दूसरी पार्टी को देने की जरूरत क्यों पड़ी।
जस्टिस कृष्णा राव ने आयोग के अधिकारियों को निष्पक्ष तरीके से काम करने की बात कही। रिपोर्टों के अनुसार, कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद इस तरह के विवाद पैदा होने पर राजनीतिक दल अदालत का रुख करते हैं और इससे न्यायालय पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
क्या है ISF के ‘लिफाफा’ सिंबल का विवाद?

दरअसल, पश्चिम बंगाल में 6 अक्टूबर 2026 को नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होना है। चुनाव आयोग ने आगामी उपचुनावों के लिए डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस को ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न आवंटित किया है।
ISF ने इस फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी है। पार्टी का कहना है कि उसने 2026 के विधानसभा चुनाव में इसी ‘लिफाफा’ चिह्न के साथ चुनाव लड़ा था और अब उपचुनाव में भी उसके उम्मीदवार मैदान में हैं। आयोग ने ISF को इस उपचुनाव के लिए ‘अलमारी’ (Almirah) चिह्न दिया है।
2026 के विधानसभा चुनाव के आधिकारिक परिणामों में भी नंदीग्राम सीट पर ISF उम्मीदवार के चुनाव लड़ने की पुष्टि होती है।
ISF ने वोटरों के भ्रम का मुद्दा उठाया
ISF की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य ने कोर्ट में दलील दी कि पार्टी ने हाल ही में विधानसभा चुनाव में ‘लिफाफा’ चिह्न का इस्तेमाल किया था। ऐसे में उसी चुनाव चिह्न को उपचुनाव में दूसरी पार्टी को दिए जाने से मतदाताओं में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।
ISF ने अदालत से मांग की है कि चुनाव आयोग को ‘लिफाफा’ चिह्न को फ्रीज करने का निर्देश दिया जाए।
चुनाव आयोग ने क्या दलील दी?

सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि ISF एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है। आयोग के वकील के मुताबिक, ऐसे दल के लिए चुनाव चिह्न स्थायी रूप से आरक्षित नहीं होता।
रिपोर्टों के अनुसार, आयोग ने यह भी बताया कि ISF को पहले दो मौकों पर ‘लिफाफा’ चिह्न आवंटित किया गया था और अंतिम बार 2026 के विधानसभा चुनाव में इसका इस्तेमाल हुआ था। इसके आधार पर आयोग ने चिह्न के आवंटन को लेकर अपना पक्ष रखा।
हाईकोर्ट ने नोटिफिकेशन को लेकर भी पूछा सवाल
सुनवाई में जस्टिस कृष्णा राव ने यह भी पूछा कि क्या उपचुनाव के लिए चुनाव चिह्न आवंटित करने से पहले कोई नया नोटिफिकेशन जारी किया गया था।
ISF की ओर से अदालत को बताया गया कि राजनीतिक दलों से सिंबल अलॉटमेंट के लिए फॉर्म 10B जमा करने के संबंध में कोई नया नोटिफिकेशन जारी नहीं किया गया था। इसके बाद कोर्ट ने चुनाव आयोग से इस प्रक्रिया को लेकर स्पष्टीकरण मांगा।
कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि यदि आयोग को पता था कि कुछ महीने पहले ही एक राजनीतिक दल ने ‘लिफाफा’ चिह्न का इस्तेमाल किया है, तो उसे उपचुनाव में किसी दूसरी पार्टी को आवंटित करने से पहले इस पहलू पर विचार क्यों नहीं किया गया।
अब सोमवार को होगी अगली सुनवाई
इस मामले में 25 सितंबर की सुनवाई के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट ने सुनवाई को आगे के लिए टाल दिया है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, अब मामले की अगली सुनवाई सोमवार को होगी। कोर्ट के सामने चुनाव आयोग को सिंबल आवंटन से जुड़े सवालों पर अपना पक्ष स्पष्ट करना है।
फिलहाल अदालत ने चुनाव आयोग के फैसले को अंतिम रूप से रद्द नहीं किया है। मामला अभी न्यायिक विचाराधीन है और अगली सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न को लेकर ISF की याचिका पर कोर्ट क्या निर्देश देता है।