Indian Navy Expansion Plan: भारतीय नौसेना अपने बेड़े को मजबूत करने और समुद्री सुरक्षा क्षमताओं का विस्तार करने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। नौसेना के 42 प्लेटफॉर्म के निर्माण के ऑर्डर पहले ही दिए जा चुके हैं, जबकि 78 अन्य प्लेटफॉर्म और 120 फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट की खरीद प्रक्रिया अलग-अलग चरणों में आगे बढ़ रही है। इन प्रस्तावित रक्षा खरीद योजनाओं की कुल लागत करीब 2.41 लाख करोड़ रुपये बताई गई है।
नौसेना के उप प्रमुख वाइस एडमिरल अजय कोचर ने सोमवार को आयोजित ‘स्वावलंबन 2026’ प्रेस वार्ता में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि नौसेना अपनी क्षमताओं को केवल समुद्र तक सीमित नहीं रख रही, बल्कि हवाई क्षेत्र, पानी के भीतर के अभियानों, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष से जुड़ी तकनीकों में भी विस्तार कर रही है।
इसके साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ड्रोन और क्वांटम टेक्नोलॉजी जैसी उभरती तकनीकों पर भी ध्यान दिया जा रहा है। इन प्रयासों का उद्देश्य बदलती समुद्री चुनौतियों के बीच भारतीय नौसेना को आधुनिक और सक्षम बनाना है।
2.41 लाख करोड़ रुपये की रक्षा खरीद योजनाएं

भारतीय नौसेना के बेड़े के विस्तार के लिए कई परियोजनाओं पर एक साथ काम किया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 42 प्लेटफॉर्म के निर्माण के ऑर्डर जारी हो चुके हैं, जबकि 78 अन्य प्लेटफॉर्म की खरीद प्रक्रिया विभिन्न चरणों में है। इसके अलावा 120 फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट खरीदने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है।
फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट का इस्तेमाल समुद्र में तेजी से निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों पर प्रतिक्रिया और तटीय सुरक्षा से जुड़े अभियानों में किया जा सकता है। ऐसे जहाज समुद्री सीमाओं के पास होने वाली गतिविधियों पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर त्वरित कार्रवाई करने में उपयोगी होते हैं।
नौसेना की इन योजनाओं को समुद्री क्षेत्र में भारत की परिचालन क्षमता बढ़ाने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, अलग-अलग परियोजनाओं की समयसीमा और वास्तविक तैनाती संबंधित खरीद तथा निर्माण प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
चार लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक के लिए RFP जारी

नौसेना के आधुनिकीकरण की योजना में लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक (LPD) और एम्फीबियस युद्धपोतों की खरीद भी शामिल है। वाइस एडमिरल अजय कोचर के मुताबिक, पिछले सप्ताह शॉर्टलिस्ट किए गए शिपयार्ड को चार LPD के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी किया गया था।
RFP खरीद प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण होता है, जिसमें संबंधित कंपनियों या शिपयार्ड से निर्धारित जरूरतों के अनुसार प्रस्ताव मांगे जाते हैं। इसके बाद प्रस्तावों का मूल्यांकन और अन्य औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी की जाती हैं।
लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक ऐसे बड़े नौसैनिक पोत होते हैं, जिनका इस्तेमाल सैनिकों, वाहनों और अन्य सैन्य संसाधनों को समुद्र के रास्ते तट तक पहुंचाने में किया जा सकता है। इनकी मदद से उभयचर अभियानों, मानवीय सहायता और आपदा के समय राहत कार्यों में भी सहायता मिल सकती है।
अगली पीढ़ी के फ्रिगेट की खरीद प्रक्रिया भी आगे बढ़ी

भारतीय नौसेना अगली पीढ़ी के फ्रिगेट की खरीद पर भी काम कर रही है। वाइस एडमिरल कोचर ने बताया कि इन युद्धपोतों के लिए कुछ सप्ताह पहले RFP जारी किया गया था।
फ्रिगेट आधुनिक नौसैनिक बेड़े का अहम हिस्सा होते हैं। इनका इस्तेमाल समुद्री निगरानी, अन्य जहाजों की सुरक्षा और विभिन्न प्रकार के नौसैनिक अभियानों में किया जाता है। आधुनिक हथियार प्रणालियों और सेंसर से लैस फ्रिगेट नौसेना की परिचालन क्षमता को मजबूत कर सकते हैं।
LPD और अगली पीढ़ी के फ्रिगेट से जुड़ी परियोजनाएं भारतीय नौसेना की दीर्घकालिक बेड़ा विस्तार योजना का हिस्सा हैं। इनकी खरीद और निर्माण से संबंधित आगे की प्रगति पर नौसेना की भविष्य की क्षमताएं निर्भर करेंगी।
स्वदेशी डीजल इंजन और मरीन गैस टर्बाइन पर जोर
Indian Navy Expansion Plan में स्वदेशी रक्षा तकनीक का विकास भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। वाइस एडमिरल कोचर के अनुसार, नौसेना ने स्वदेशी डीजल इंजन विकसित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
इसके अलावा 24 से 28 मेगावाट क्षमता वाले मरीन गैस टर्बाइन के विकास के लिए सरकार से मंजूरी मिल चुकी है। मरीन गैस टर्बाइन का इस्तेमाल नौसैनिक पोतों को शक्ति देने के लिए किया जाता है।
स्वदेशी इंजन और टर्बाइन विकसित करने का उद्देश्य रक्षा उपकरणों के लिए विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करना और देश के भीतर डिजाइन, निर्माण तथा रखरखाव की क्षमता बढ़ाना है। इससे भविष्य में नौसैनिक प्लेटफॉर्म के निर्माण और उनके संचालन में घरेलू उद्योग की भूमिका मजबूत हो सकती है।
हालांकि, इन तकनीकों को विकसित करने, परीक्षण करने और नौसेना में शामिल करने के लिए अलग-अलग तकनीकी चरणों से गुजरना होगा।
AI, ड्रोन और क्वांटम टेक्नोलॉजी पर भी काम
भारतीय नौसेना अपनी पारंपरिक समुद्री क्षमताओं के साथ नई तकनीकों को भी अपनाने की दिशा में काम कर रही है। वाइस एडमिरल कोचर ने बताया कि नौसेना हवाई, समुद्री, पानी के भीतर, साइबर और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में क्षमताओं का विकास कर रही है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल डेटा विश्लेषण, निगरानी और निर्णय लेने में सहायता के लिए किया जा सकता है। वहीं, ड्रोन समुद्र और तटीय इलाकों की निगरानी के साथ कुछ विशेष अभियानों में उपयोगी हो सकते हैं।
क्वांटम टेक्नोलॉजी और साइबर क्षमताओं पर काम भविष्य में सुरक्षित संचार, डेटा सुरक्षा तथा उन्नत तकनीकी प्रणालियों के विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इन क्षेत्रों में प्रगति से नौसेना को आधुनिक समुद्री चुनौतियों का सामना करने में मदद मिल सकती है।
ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा में 1.7 अरब डॉलर के कार्गो को सुरक्षा
नौसेना ने समुद्री सुरक्षा के साथ ऊर्जा आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा में भी अपनी भूमिका निभाई है। वाइस एडमिरल कोचर के अनुसार, ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा के तहत 1.7 अरब डॉलर मूल्य के कार्गो को सुरक्षा प्रदान की गई।
उन्होंने बताया कि इस अभियान के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली भारत आने वाली तेल और गैस की खेपों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने में मदद की गई।
होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिहाज से महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यहां से गुजरने वाली तेल और गैस की आपूर्ति में किसी भी तरह का व्यवधान ऊर्जा बाजार और आयात पर असर डाल सकता है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए ऐसे मार्गों की सुरक्षा विशेष महत्व रखती है।
नौसेना की ओर से कार्गो को सुरक्षा दिए जाने की जानकारी समुद्री अभियानों में उसकी भूमिका को दर्शाती है। ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा के साथ-साथ व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही भी भारत की समुद्री रणनीति का अहम हिस्सा है।
समुद्री सुरक्षा के लिए क्यों अहम है नौसेना का विस्तार?
भारत की लंबी समुद्री तटरेखा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर समुद्री मार्गों की निर्भरता को देखते हुए नौसेना की क्षमता बढ़ाना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। आधुनिक युद्धपोत, तेज गश्ती नौकाएं और उन्नत निगरानी प्रणालियां समुद्री क्षेत्र में मौजूद चुनौतियों का सामना करने में मदद कर सकती हैं।
नौसेना के बेड़े का विस्तार समुद्री निगरानी, तटीय सुरक्षा और जरूरत पड़ने पर दूरस्थ क्षेत्रों में अभियान चलाने की क्षमता को बेहतर बना सकता है। वहीं, स्वदेशी तकनीक पर जोर देने से भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता और घरेलू उद्योग को भी प्रोत्साहन मिलने की संभावना है।
हालांकि, प्रस्तावित परियोजनाओं का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि खरीद प्रक्रिया कितनी तेजी से पूरी होती है और नए प्लेटफॉर्म कब तक नौसेना में शामिल किए जाते हैं।
आगे क्या है भारतीय नौसेना की योजना?
Indian Navy Expansion Plan के तहत भारतीय नौसेना एक ओर 42 ऑर्डर किए गए प्लेटफॉर्म के निर्माण पर आगे बढ़ रही है, तो दूसरी ओर 78 अतिरिक्त प्लेटफॉर्म और 120 फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट की खरीद प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही है।
चार लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक और अगली पीढ़ी के फ्रिगेट से जुड़ी खरीद प्रक्रिया, स्वदेशी डीजल इंजन तथा मरीन गैस टर्बाइन का विकास और उभरती तकनीकों पर काम इस व्यापक योजना के प्रमुख हिस्से हैं।
ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा के दौरान समुद्री कार्गो को सुरक्षा देने का उल्लेख भी यह बताता है कि नौसेना की जिम्मेदारी केवल सैन्य तैयारी तक सीमित नहीं है। भारत की ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार की सुरक्षा भी उसकी प्राथमिकताओं में शामिल है।
आने वाले समय में इन परियोजनाओं की प्रगति भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता, स्वदेशी रक्षा उत्पादन और समुद्री सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण होगी।