Bastar Dussehra 2026: जब देश के अलग-अलग हिस्सों में दशहरे पर रावण के पुतले जलाए जाते हैं और रामलीला के जरिए भगवान राम की विजय का उत्सव मनाया जाता है, तब छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक अलग ही परंपरा देखने को मिलती है। यहां दशहरा न तो रावण दहन के लिए जाना जाता है और न ही रामलीला के लिए। बस्तर का दशहरा आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की उपासना, आदिवासी परंपराओं और विशाल लकड़ी के रथ से जुड़ा पर्व है।
इस उत्सव की सबसे खास बात यह है कि इसे परंपरागत रूप से करीब 75 से 76 दिनों तक मनाया जाता है। इसकी अलग-अलग रस्मों में बस्तर के अनेक आदिवासी समुदाय और गांव अपनी निर्धारित भूमिका निभाते हैं। कोई रथ के लिए लकड़ी लाता है, कोई उसे तैयार करता है, कोई रस्सी बनाता है और कोई रथ खींचने की जिम्मेदारी निभाता है।
बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यहां की सामुदायिक एकता, लोक आस्था और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है।
न रावण दहन, न रामलीला; देवी दंतेश्वरी की होती है आराधना

देश के अधिकांश हिस्सों में दशहरा भगवान राम की ओर से रावण पर विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। लेकिन बस्तर में दशहरे का स्वरूप अलग है। यहां मुख्य केंद्र मां दंतेश्वरी हैं, जिन्हें बस्तर की आराध्य देवी माना जाता है।
Bastar Dussehra 2026 में भी इस परंपरा की पहचान देवी की पूजा, रथ यात्रा और विभिन्न पारंपरिक अनुष्ठानों से जुड़ी रहेगी। यहां रावण का पुतला जलाकर उत्सव समाप्त नहीं किया जाता। इसके बजाय कई सप्ताह तक चलने वाली रस्मों के माध्यम से देवी के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।
बस्तर दशहरा की विशेषता यह भी है कि इसमें अलग-अलग समुदायों की भूमिका पहले से निर्धारित है। इस वजह से यह पर्व किसी एक गांव या समूह तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे बस्तर की सामूहिक भागीदारी का उत्सव बन जाता है।
600 साल पुरानी परंपरा से जुड़ा है बस्तर दशहरा

बस्तर दशहरे के इतिहास को करीब 600 साल पुराना माना जाता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत बस्तर के चालुक्य वंश के राजा पुरुषोत्तम देव के समय से जुड़ी है।
कहा जाता है कि राजा पुरुषोत्तम देव जगन्नाथपुरी की यात्रा पर गए थे। इस यात्रा में उनके साथ विभिन्न समुदायों के प्रमुख भी शामिल हुए। मान्यता है कि जगन्नाथपुरी के राजा ने उन्हें एक विशाल रथ भेंट किया था।
बस्तर लौटने के बाद रथ को भगवान जगन्नाथ और देवी दंतेश्वरी की परंपराओं से जोड़कर इस्तेमाल किया जाने लगा। लोकमान्यता के अनुसार, रथ के पहियों का एक हिस्सा भगवान जगन्नाथ को और बाकी देवी दंतेश्वरी को समर्पित किया गया। इसी परंपरा से बस्तर दशहरे में देवी के छत्र को रथ पर विराजित करने और रथ यात्रा निकालने की प्रथा विकसित हुई।
हालांकि, इस इतिहास से जुड़ी कई बातें स्थानीय मान्यताओं और परंपरागत विवरणों पर आधारित हैं। बस्तर दशहरे की पीढ़ियों से चली आ रही रस्में आज भी इस सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए हैं।
जंगल की लकड़ी से तैयार होता है विशाल रथ

बस्तर दशहरे की शुरुआत से जुड़ी प्रमुख रस्मों में पाठ जात्रा का विशेष महत्व है। परंपरा के अनुसार, हरेली अमावस्या के अवसर पर जगदलपुर में मां दंतेश्वरी मंदिर के सामने जंगल से लाई गई लकड़ी का एक बड़ा कुंदा रखा जाता है। इसे स्थानीय परंपरा में ‘ठुरलू खोटला’ कहा जाता है।
इस लकड़ी और रथ निर्माण में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक औजारों की पूजा की जाती है। इसके बाद रथ तैयार करने की प्रक्रिया शुरू होती है।
झारउमरगांव और बेड़ाउमरगांव के कारीगर पारंपरिक औजारों की मदद से रथ के अलग-अलग हिस्से तैयार करते हैं। रथ निर्माण में बसूला, कुल्हाड़ी और बिंधना जैसे औजारों का इस्तेमाल किया जाता है। इस काम में मशीनों के बजाय पारंपरिक कौशल और पीढ़ियों से मिले अनुभव की अहम भूमिका रहती है।
रथ के लिए लकड़ी और अन्य जरूरी सामग्री अलग-अलग गांवों से जुटाई जाती है। इसकी रस्सी तैयार करने और रथ को खींचने की जिम्मेदारी भी विभिन्न समुदायों में बंटी हुई है। यही व्यवस्था बस्तर दशहरे को सामुदायिक भागीदारी का अनूठा उदाहरण बनाती है।
काछिन देवी की अनुमति से शुरू होता है दशहरा
बस्तर दशहरे की प्रमुख रस्मों में काछिन देवी की अनुमति को विशेष महत्व दिया जाता है। परंपरा के अनुसार, जगदलपुर के भंगाराम चौक स्थित काछिनगुड़ी में पनका समुदाय की एक बालिका पर देवी का आवेश आने की मान्यता है। इसके बाद वह कांटों के झूले पर बैठती है और दशहरा शुरू करने की अनुमति देने की रस्म निभाती है।
काछिन देवी को स्थानीय आदिवासी समुदायों की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। इस अनुष्ठान के साथ उत्सव की आगे की रस्मों का सिलसिला शुरू होता है।
इस परंपरा का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। यह दिखाता है कि बस्तर दशहरे में स्थानीय समुदायों की मान्यताओं और उनकी सांस्कृतिक पहचान को कितना महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
काछिन देवी की प्रतिनिधि पीहू बनना चाहती हैं कलेक्टर
बस्तर दशहरे की परंपराओं में काछिन देवी की प्रतिनिधि बनने वाली बालिका की भूमिका भी चर्चा में रहती है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाली 10 वर्षीय पीहू पिछले पांच वर्षों से यह भूमिका निभा रही हैं।
पीहू का सपना बड़ी होकर कलेक्टर बनने का है। उनका कहना है कि जब वह काछिन देवी की प्रतिनिधि बनती हैं, तो उन्हें महसूस होता है कि उस समय वह केवल पीहू नहीं रहतीं, बल्कि देवी की तरह लोगों को दर्शन देती हैं।
इस रस्म के दौरान बड़ी संख्या में लोग उनके दर्शन के लिए पहुंचते हैं। दूसरे क्षेत्रों से देवी-देवताओं को भी यहां लाया जाता है। पीहू की भूमिका इस बात को रेखांकित करती है कि बस्तर दशहरे में स्थानीय आस्था और परंपराएं किस तरह नई पीढ़ी से जुड़ी हुई हैं।
हजारों लोग खींचते हैं देवी का रथ
बस्तर दशहरे के दौरान रथ यात्रा सबसे आकर्षक आयोजनों में से एक होती है। आश्विन शुक्ल पक्ष की द्वितीया से सप्तमी तक फूलों से सजाए गए रथ की परिक्रमा की जाती है। इस दौरान हजारों ग्रामीण मोटी पारंपरिक रस्सियों को पकड़कर रथ खींचते हैं।
रथ यात्रा में देवी दंतेश्वरी का छत्र प्रमुख स्थान रखता है। पुलिस के जवान देवी को सशस्त्र सलामी देते हैं, जबकि महिलाएं रथ की नजर उतारने और पुष्प वर्षा जैसी परंपराओं में हिस्सा लेती हैं।
रथ खींचने का अधिकार भी परंपरा के अनुसार निर्धारित है। विजय रथ खींचने में किलेपाल परगना के माड़िया आदिवासियों की विशेष भूमिका बताई जाती है। इस तरह रथ यात्रा में धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक जिम्मेदारियों और सामुदायिक परंपराओं का भी निर्वाह होता है।
निशा जात्रा और भीतर रैनी की अनूठी रस्में
बस्तर दशहरे की रस्मों में अष्टमी की आधी रात होने वाली निशा जात्रा का भी खास स्थान है। इस अवसर पर मां दंतेश्वरी मंदिर से देवी की डोली निकलती है और निशा जात्रा मंदिर तक पहुंचती है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, यह मंदिर साल में विशेष अवसर पर ही खुलता है।
विजयादशमी के दिन आठ पहियों वाला विजय रथ निकाला जाता है। परिक्रमा के बाद देर रात रथ को प्रतीकात्मक रूप से वहां से ले जाकर कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपा दिया जाता है। इस रस्म को ‘भीतर रैनी’ कहा जाता है।
कुम्हड़ाकोट में अलग-अलग क्षेत्रों से देवी-देवताओं को लाने की परंपरा भी जुड़ी हुई है। अगले दिन नए अन्न का भोग लगाने और नवाखानी मनाने के बाद रथ को वापस लाया जाता है। इन रस्मों के जरिए बस्तर दशहरा स्थानीय धार्मिक परंपराओं, कृषि संस्कृति और सामुदायिक मेल-जोल को एक साथ जोड़ता है।
मुरिया दरबार में उठते हैं लोगों के मुद्दे
बस्तर दशहरे के अंतिम चरण में मुरिया दरबार आयोजित किया जाता है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इसकी शुरुआत 8 मार्च 1876 को हुई थी। रियासत काल में मांझी, मुखिया, चालकी और नाईक जैसे पारंपरिक प्रतिनिधि अपने क्षेत्रों की समस्याएं राजा के सामने रखते थे।
आज इस परंपरा का स्वरूप बदल गया है। अब स्थानीय जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी लोगों के मुद्दों पर चर्चा करते हैं। इस आयोजन को बस्तर की पारंपरिक प्रशासनिक व्यवस्था और आधुनिक लोकतांत्रिक संवाद के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाता है।
मुरिया दरबार के बाद बाहर से आए देवी-देवताओं को सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है। दंतेवाड़ा से आने वाली मावली माता की डोली और मां दंतेश्वरी का छत्र शोभायात्रा के साथ अपने धाम की ओर लौटते हैं।
बस्तर दशहरा क्यों है दुनिया से अलग?
Bastar Dussehra 2026 की पहचान इसकी लंबी अवधि, विशाल रथ, देवी दंतेश्वरी की आराधना और विभिन्न आदिवासी समुदायों की सामूहिक भागीदारी से है। यहां उत्सव का केंद्र किसी प्रतीकात्मक विजय के लिए पुतला जलाना नहीं, बल्कि परंपराओं को निभाना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है।
रथ बनाने वाले कारीगर, रस्सी तैयार करने वाले ग्रामीण, रथ खींचने वाले समुदाय, देवी की प्रतिनिधि बनने वाली बालिका और मुरिया दरबार में भाग लेने वाले स्थानीय प्रतिनिधि—सभी इस उत्सव के अलग-अलग हिस्से हैं।
दशहरा समाप्त होने पर रथ लौट जाता है और दूर-दराज के गांवों से आए लोग अपने घरों की ओर रवाना हो जाते हैं। लेकिन परंपरा यहीं खत्म नहीं होती। अगले साल फिर जंगल से लकड़ी लाई जाती है, कारीगर अपने औजार निकालते हैं, रस्सियां तैयार होती हैं और हजारों लोग देवी के रथ को खींचने के लिए एक साथ जुटते हैं।
यही बस्तर दशहरे की सबसे बड़ी खासियत है—यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक पहचान, लोक आस्था और सामुदायिक एकता की जीवित विरासत है।