Bastar Dussehra kachan devi : बस्तर दशहरा विवाद ने काछन देवी की पारंपरिक भूमिका और पनिका समाज के प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। पनिका समाज का आरोप है कि राष्ट्रपति के समक्ष आयोजित कार्यक्रम के दौरान सदियों पुरानी परंपरा के अनुरूप समाज की बेटी को अपेक्षित स्थान और सम्मान नहीं दिया गया। इस मामले को लेकर समाज में नाराजगी जताई गई है। सुमित दास महंत ने पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराने के साथ ही दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों एवं कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
बस्तर का ऐतिहासिक दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की आदिवासी संस्कृति, लोकआस्था, राजपरंपरा और सामुदायिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। इस उत्सव से जुड़ी विभिन्न रस्मों और पारंपरिक भूमिकाओं का अपना विशिष्ट महत्व है। ऐसे में काछन देवी की परंपरा को लेकर उठे सवालों ने सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और परंपराओं के सम्मान से जुड़ी बहस को सामने ला दिया है।
हालांकि, इस मामले में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है। इसलिए पूरे घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति जांच और संबंधित दस्तावेजों के आधार पर स्पष्ट होना जरूरी है।
काछन देवी की परंपरा को लेकर क्या है विवाद?
पनिका समाज के प्रतिनिधि सुमित दास महंत के अनुसार, बस्तर दशहरा में काछन देवी की भूमिका ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। समाज का आरोप है कि राष्ट्रपति के आगमन के दौरान काछन देवी की पारंपरिक भूमिका में पनिका समाज की बेटी को अपेक्षित स्थान नहीं मिला और उसके स्थान पर किसी अन्य बच्ची को प्रस्तुत किया गया।

समाज का कहना है कि यदि परंपरा के निर्वहन में ऐसा हुआ है, तो यह केवल प्रतिनिधित्व से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि बस्तर की ऐतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक परंपराओं की प्रामाणिकता से भी संबंधित है।
सुमित दास महंत ने कहा कि सदियों से चली आ रही परंपराओं का निर्वहन करते समय ऐतिहासिक तथ्यों और संबंधित समुदाय की भूमिका का सम्मान किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, किसी समुदाय की परंपरा की अनदेखी होने से उसकी भावनाओं और सामाजिक पहचान पर असर पड़ सकता है।
इसलिए समाज चाहता है कि संबंधित कार्यक्रम में काछन देवी की भूमिका, परंपरा के निर्वहन की प्रक्रिया और प्रतिनिधित्व से जुड़े तथ्यों की जांच कर उन्हें स्पष्ट किया जाए।
राष्ट्रपति के समक्ष परंपरा की गलत प्रस्तुति हुई तो हो जांच

सुमित दास महंत ने राष्ट्रपति के समक्ष ऐतिहासिक परंपराओं की प्रस्तुति को गंभीर जिम्मेदारी बताते हुए मामले की जांच की मांग की है। उनका कहना है कि देश की प्रथम नागरिक के सामने किसी भी सांस्कृतिक परंपरा का परिचय तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर दिया जाना चाहिए।
उन्होंने मांग की कि यदि कार्यक्रम के दौरान संबंधित अधिकारियों या जिम्मेदार व्यक्तियों की ओर से लापरवाही हुई अथवा परंपरा के बारे में गलत जानकारी प्रस्तुत की गई, तो इसकी निष्पक्ष जांच कराई जाए।
समाज की मांग है कि जांच के दौरान कार्यक्रम की तैयारियों, पारंपरिक भूमिका तय करने की प्रक्रिया और संबंधित लोगों की जिम्मेदारी की पड़ताल की जाए। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की गलती प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।
महंत ने यह भी कहा कि सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को केवल औपचारिक आयोजन तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए परंपराओं से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों और समुदायों की भूमिका को समझना और उनका सम्मान करना जरूरी है।

दोषी अधिकारियों को पद से हटाने की मांग
पनिका समाज ने इस मामले में केवल जांच की मांग नहीं की है, बल्कि दोषी पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग भी उठाई है।
सुमित दास महंत के मुताबिक, यदि जांच में यह साबित होता है कि किसी अधिकारी या कर्मचारी ने जानबूझकर परंपरा की अनदेखी की या गलत प्रस्तुति दी, तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। समाज की ओर से दोषियों को पद से हटाने और बर्खास्त करने की मांग भी की गई है।
हालांकि, किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी और दोष का निर्धारण जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही किया जा सकता है। फिलहाल, समाज की ओर से लगाए गए आरोपों की पुष्टि होना बाकी है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित प्रशासन मामले की जांच को लेकर क्या कदम उठाता है और काछन देवी की पारंपरिक भूमिका से जुड़े तथ्यों को किस तरह स्पष्ट किया जाता है।
पनिका-पनका समाज ने 1971 के जनजातीय दर्जे का मुद्दा भी उठाया
बस्तर दशहरा विवाद के बीच पनिका-पनका समाज ने अनुसूचित जनजाति की सूची में अपने दर्जे से जुड़े ऐतिहासिक मुद्दे को भी उठाया है। समाज का कहना है कि 8 दिसंबर 1971 को मध्यप्रदेश के आठ जिलों में अनुसूचित जनजाति की सूची से हटाए जाने का विषय आज भी उसकी पहचान और अधिकारों से जुड़ा हुआ है।
समाज ने इस मुद्दे पर ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर समीक्षा करने और न्यायसंगत पहल की मांग की है। सुमित दास महंत के अनुसार, समुदाय लंबे समय से अपनी सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों के सम्मान के लिए प्रयास करता रहा है।
समाज का मानना है कि पारंपरिक प्रतिनिधित्व को लेकर उठे मौजूदा सवालों को उसके व्यापक ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।
हालांकि, वर्ष 1971 में सूची से हटाए जाने के दावे और उससे संबंधित कानूनी स्थिति को स्पष्ट करने के लिए आधिकारिक अधिसूचनाओं, ऐतिहासिक दस्तावेजों और संबंधित सरकारी रिकॉर्ड की जांच आवश्यक है। इस विषय पर समाज की मांग है कि तथ्यों की समीक्षा कर उचित समाधान की दिशा में पहल की जाए।
राष्ट्रपति, राज्यपाल और मुख्यमंत्री से उच्चस्तरीय जांच की मांग
सुमित दास महंत ने राष्ट्रपति, राज्यपाल और मुख्यमंत्री से पूरे घटनाक्रम की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि काछन देवी की परंपरा, पनिका समाज की बेटी की भूमिका और राष्ट्रपति के कार्यक्रम में हुए प्रतिनिधित्व से जुड़े तथ्यों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
समाज चाहता है कि जांच के जरिए यह स्पष्ट हो कि कार्यक्रम में पारंपरिक भूमिका तय करने की प्रक्रिया क्या थी, संबंधित समुदाय के प्रतिनिधित्व को लेकर कौन-से निर्णय लिए गए और उन निर्णयों के पीछे क्या आधार था।
महंत ने कहा कि जांच में गंभीर लापरवाही या जानबूझकर परंपरा की अनदेखी की पुष्टि होने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
इस मांग के साथ समाज ने जवाबदेही तय करने और भविष्य में इस तरह के विवाद से बचने के लिए पारंपरिक आयोजनों में स्पष्ट प्रक्रिया अपनाने पर भी जोर दिया है।
बस्तर दशहरा की सांस्कृतिक विरासत का महत्व
बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट परंपराओं और लंबे ऐतिहासिक महत्व के कारण देश के अन्य दशहरा आयोजनों से अलग पहचान रखता है। इसमें स्थानीय देवी-देवताओं, समुदायों और पारंपरिक भूमिकाओं का विशेष स्थान है। यह उत्सव क्षेत्र की सामाजिक संरचना और लोकआस्था से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
ऐसे आयोजनों में अलग-अलग समुदायों की पारंपरिक भागीदारी को लेकर स्पष्टता बनाए रखना महत्वपूर्ण है। इससे न केवल सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण होता है, बल्कि समुदायों के बीच विश्वास भी मजबूत होता है।
पनिका समाज का कहना है कि काछन देवी की परंपरा और समाज की बेटी के प्रतिनिधित्व को लेकर उठे सवालों का समाधान तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। समाज चाहता है कि उसकी ऐतिहासिक भूमिका को उचित सम्मान मिले और किसी भी प्रकार की गलतफहमी दूर हो।
जांच के निष्कर्षों पर टिकी निगाहें
बस्तर दशहरा विवाद में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि राष्ट्रपति के कार्यक्रम के दौरान काछन देवी की पारंपरिक भूमिका किस प्रकार निर्धारित की गई थी और पनिका समाज की ओर से लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है।
इसके लिए संबंधित कार्यक्रम के रिकॉर्ड, परंपरा से जुड़े दस्तावेजों और जिम्मेदार अधिकारियों के पक्ष को सामने लाना जरूरी होगा। साथ ही, पनिका-पनका समाज के अनुसूचित जनजाति दर्जे से जुड़े ऐतिहासिक दावे की भी आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर समीक्षा किए जाने की मांग उठाई गई है।
पनिका समाज ने बस्तर दशहरा की परंपरा के सम्मान और काछन देवी की भूमिका से जुड़े विवाद की निष्पक्ष जांच की मांग की है। सुमित दास महंत ने राष्ट्रपति, राज्यपाल और मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की अपील करते हुए कहा है कि यदि जांच में किसी अधिकारी या कर्मचारी की गलती साबित होती है, तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। मामले की वास्तविक स्थिति संबंधित पक्षों के जवाब और जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी।