chhattisgarh smart city project : छत्तीसगढ़ स्मार्ट सिटी परियोजना एक बार फिर सवालों के घेरे में है। रायपुर और बिलासपुर जैसे प्रमुख शहरों में करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद अपेक्षित शहरी विकास नहीं होने को लेकर बहस तेज हो गई है। वहीं, नवा रायपुर में सड़कें, सरकारी भवन और दूसरी बुनियादी सुविधाएं विकसित किए जाने के बाद भी शहर में आम लोगों की बसाहट अपेक्षित गति से नहीं बढ़ने की चुनौती बनी हुई है। नगरीय प्रशासन मंत्री अरुण साव ने स्मार्ट सिटी के कार्यों को लेकर पिछली कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं।

स्मार्ट सिटी परियोजना का उद्देश्य शहरों को आधुनिक सुविधाओं से लैस करना, यातायात व्यवस्था बेहतर बनाना, नागरिक सुविधाओं का विस्तार करना और तकनीक के माध्यम से शहरी प्रबंधन को मजबूत करना था। हालांकि, परियोजना के तहत हुए खर्च और जमीन पर नजर आने वाले विकास के बीच अंतर को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
करोड़ों खर्च होने के बाद भी क्यों उठ रहे सवाल?
छत्तीसगढ़ स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत रायपुर और बिलासपुर में कई विकास कार्यों की योजना बनाई गई थी। इन योजनाओं से बेहतर सड़कें, व्यवस्थित बाजार, आधुनिक सार्वजनिक सुविधाएं, स्वच्छता व्यवस्था और बेहतर जल निकासी जैसी सुविधाएं विकसित किए जाने की उम्मीद थी।
इसके बावजूद शहरों में स्मार्ट सिटी की परिकल्पना के अनुरूप व्यापक बदलाव नजर नहीं आने की शिकायतें सामने आती रही हैं। सवाल यह है कि जब शहरों के विकास के लिए बड़ी राशि स्वीकृत की गई और विभिन्न कार्यों के लिए आदेश भी जारी हुए, तो नागरिकों को अपेक्षित सुविधाएं कितनी मिल पाईं?
स्मार्ट सिटी का आकलन केवल निर्माण कार्यों की संख्या या खर्च की गई राशि के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह देखना भी जरूरी है कि परियोजनाओं से आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में कितना सुधार आया, यातायात और सफाई व्यवस्था कितनी बेहतर हुई और नागरिक सुविधाओं तक लोगों की पहुंच कितनी आसान हुई।
कैग रिपोर्ट में खर्च के आंकड़े क्या बताते हैं?

स्मार्ट सिटी परियोजना के खर्च को लेकर उपलब्ध कैग रिपोर्ट के आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं। खबर में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ के तीन शहरों को स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करने के लिए कुल 9,627.70 करोड़ रुपये की परियोजना लागत स्वीकृत थी।
मार्च 2023 तक 476 कार्यादेशों के तहत 2,644.44 करोड़ रुपये के कार्य आवंटित किए गए थे। वहीं, वास्तविक व्यय 1,213.12 करोड़ रुपये दर्ज किया गया था।
इन आंकड़ों के आधार पर स्वीकृत परियोजना लागत, आवंटित कार्यों और वास्तविक खर्च के बीच अंतर दिखाई देता है। हालांकि, केवल इन आंकड़ों से किसी विशेष कार्य में अनियमितता या भ्रष्टाचार साबित नहीं होता। इसके लिए संबंधित परियोजनाओं का विवरण, कार्यों की प्रगति, भुगतान और जांच के निष्कर्षों को देखना जरूरी है।
फिर भी, जब शहरी विकास की बड़ी योजनाओं पर खर्च होता है, तो उनकी प्रगति और परिणामों की पारदर्शी जानकारी आम जनता तक पहुंचना महत्वपूर्ण हो जाता है।
रायपुर और बिलासपुर में स्मार्ट सुविधाओं की चुनौती

राजधानी रायपुर और न्यायधानी बिलासपुर में स्मार्ट सिटी परियोजनाओं से शहरों की बुनियादी सुविधाओं में बड़े बदलाव की उम्मीद की गई थी। बेहतर सड़कें, सुचारु यातायात, आधुनिक बाजार, व्यवस्थित सार्वजनिक स्थान और प्रभावी नागरिक सेवाएं इस योजना के प्रमुख उद्देश्य थे।
लेकिन परियोजना के अपेक्षित परिणामों को लेकर सवाल उठने के बाद यह चर्चा महत्वपूर्ण हो गई है कि स्वीकृत योजनाओं में से कितने कार्य पूरे हुए और उनका वास्तविक लाभ शहरवासियों को कितना मिला।
शहरी विकास की सफलता केवल सड़कों, भवनों या अन्य संरचनाओं के निर्माण से तय नहीं होती। शहर में जल निकासी, कचरा प्रबंधन, सार्वजनिक परिवहन, पैदल चलने वालों की सुविधा और नागरिक शिकायतों के समाधान जैसी व्यवस्थाएं भी उतनी ही जरूरी हैं।
इसलिए रायपुर और बिलासपुर में स्मार्ट सिटी के कामों का मूल्यांकन करते समय परियोजनाओं की लागत के साथ उनकी गुणवत्ता, उपयोगिता और रखरखाव की स्थिति पर भी ध्यान देना होगा।
नवा रायपुर में अधोसंरचना के बाद बसाहट बड़ी चुनौती
नवा रायपुर में सड़कें, सरकारी भवन और दूसरी बुनियादी सुविधाएं विकसित करने पर जोर दिया गया है। इसके बावजूद शहर में आम लोगों की बसाहट को अपेक्षित गति नहीं मिलने का मुद्दा सामने आता रहा है।
किसी नए शहर को सफल बनाने के लिए केवल आधुनिक अधोसंरचना तैयार करना पर्याप्त नहीं होता। वहां रोजगार के अवसर, किफायती आवास, सार्वजनिक परिवहन, स्कूल, अस्पताल, बाजार और रोजमर्रा की जरूरी सेवाएं उपलब्ध होना भी आवश्यक है।
यदि इन सुविधाओं का विकास लोगों की जरूरतों और आर्थिक गतिविधियों के अनुरूप नहीं होता, तो तैयार अधोसंरचना के बावजूद स्थायी आबादी बढ़ने की रफ्तार धीमी रह सकती है।
नवा रायपुर के मामले में भी यही सवाल महत्वपूर्ण है कि उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं को आम लोगों की जरूरतों से किस तरह जोड़ा जाए, ताकि शहर में आवासीय गतिविधियों, रोजगार और व्यावसायिक विकास को गति मिल सके।
स्मार्ट सिटी के कामों पर शिकायतें, जांच को लेकर भी सवाल
स्मार्ट सिटी परियोजना के कामों को लेकर पहले भी राजनीतिक स्तर पर सवाल उठाए गए थे। खबर के मुताबिक, रायपुर नगर निगम में कांग्रेस के शासनकाल के दौरान भाजपा विपक्ष में थी। उस समय नेता प्रतिपक्ष और पार्षदों ने परियोजना के कार्यों और खर्च को लेकर आपत्तियां जताई थीं।
खबर में यह भी उल्लेख है कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ सांसद और विधायक स्तर पर शिकायतें की गई थीं तथा मामला केंद्रीय स्तर तक पहुंचाया गया था। हालांकि, इन शिकायतों के बाद जांच की क्या स्थिति रही और किन मामलों में क्या निष्कर्ष निकले, इसकी विस्तृत जानकारी सामने होना जरूरी है।
अब इस मुद्दे पर यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि पहले शिकायत करने वाले लोगों ने बाद में जांच की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए कितनी सक्रियता दिखाई। इस संबंध में किसी व्यक्ति या संस्था की भूमिका पर निष्कर्ष निकालने से पहले आधिकारिक रिकॉर्ड और जांच की स्थिति स्पष्ट होना आवश्यक है।
सार्वजनिक धन से जुड़ी परियोजनाओं में शिकायतों की जांच समय पर पूरी होना और उसके नतीजे सार्वजनिक किए जाना जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
अरुण साव ने कांग्रेस पर लगाए भ्रष्टाचार के आरोप
छत्तीसगढ़ के नगरीय प्रशासन मंत्री अरुण साव ने स्मार्ट सिटी परियोजना के कामों को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा है। उनके मुताबिक, कांग्रेस के कार्यकाल में स्मार्ट सिटी के कार्यों में जमकर भ्रष्टाचार हुआ और शहरों को स्मार्ट सिटी की परिकल्पना के अनुरूप विकसित नहीं किया गया।
अरुण साव का कहना है कि मौजूदा सरकार प्रमुख शहरों में बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने और विकास कार्यों को आगे बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है।
मंत्री के बयान के बाद स्मार्ट सिटी परियोजना के खर्च, कामों की गुणवत्ता और पिछली योजनाओं के परिणामों को लेकर राजनीतिक बहस तेज होने की संभावना है। हालांकि, कांग्रेस पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों की पुष्टि के लिए संबंधित जांच रिपोर्ट, ऑडिट निष्कर्ष और आधिकारिक दस्तावेजों का सामने आना जरूरी है।
अर्बन फंड चैलेंज योजना से विकास को नई गति देने की तैयारी
शहरों के विकास और अधूरी बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए अब अर्बन फंड चैलेंज योजना के तहत नई कार्ययोजना तैयार करने की कवायद की जा रही है। इस पहल से शहरी अधोसंरचना को मजबूत करने और नागरिक सुविधाओं में सुधार लाने की उम्मीद जताई जा रही है।
नई योजनाओं के तहत शहरों में विकास कार्यों को आगे बढ़ाते समय स्थानीय जरूरतों, परियोजनाओं की उपयोगिता और उनके रखरखाव पर ध्यान देना महत्वपूर्ण होगा। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि हर परियोजना के लिए स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किए जाएं और काम की प्रगति की नियमित निगरानी हो।
यदि नई योजनाओं में खर्च और परिणामों की जानकारी सार्वजनिक रखी जाती है, तो इससे सरकारी कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
अब सबसे बड़ा सवाल: खर्च के अनुरूप मिला विकास?
छत्तीसगढ़ स्मार्ट सिटी परियोजना को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं मिलेगा। इसके लिए यह स्पष्ट होना जरूरी है कि कितने कार्य स्वीकृत हुए, कितने पूरे किए गए, किन परियोजनाओं पर कितना खर्च हुआ और नागरिकों को उनसे क्या लाभ मिला।
कैग रिपोर्ट में दर्ज आंकड़ों, परियोजनाओं की मौजूदा स्थिति और संबंधित विभागों के आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर विस्तृत समीक्षा से ही स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है।
रायपुर, बिलासपुर और नवा रायपुर में शहरी विकास को गति देने के लिए जरूरी है कि अधूरी परियोजनाओं की पहचान की जाए, जवाबदेही तय हो और भविष्य की योजनाओं को लोगों की वास्तविक जरूरतों से जोड़ा जाए।
कुल मिलाकर, स्मार्ट सिटी परियोजना पर खर्च और उसके परिणामों के बीच अंतर को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब पारदर्शी समीक्षा और ठोस कार्रवाई से ही मिल सकता है। अब देखना होगा कि अर्बन फंड चैलेंज के तहत तैयार होने वाली योजनाएं शहरों को बेहतर नागरिक सुविधाएं देने में कितनी सफल होती हैं।