Supreme Court DNPA : डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून को लेकर मीडिया की स्वतंत्रता और पत्रकारिता के अधिकारों पर बहस तेज हो गई है। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने इस कानून के कुछ प्रावधानों और संबंधित नियमों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। संगठन का तर्क है कि कानून के कुछ प्रावधान खोजी पत्रकारिता, लाइव रिपोर्टिंग और पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं।
मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका पर सुनवाई की। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। DNPA की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने पक्ष रखा। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर उसका जवाब मांगा है।
DNPA ने अदालत से डेटा प्रोटेक्शन कानून के कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करने और चुनौती दिए गए प्रावधानों पर रोक लगाने की मांग की है। संगठन का कहना है कि यदि पत्रकारों को खबर प्रकाशित करने से पहले संबंधित व्यक्ति के डेटा के इस्तेमाल के लिए उसकी अनुमति पर निर्भर रहना पड़ेगा, तो स्वतंत्र पत्रकारिता और सार्वजनिक हित से जुड़ी रिपोर्टिंग प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में उठाए गए सवालों पर अंतिम फैसला आना बाकी है।
DNPA ने डेटा प्रोटेक्शन कानून को क्यों दी चुनौती?

Supreme Court DNPA : का मुख्य मुद्दा डेटा की सुरक्षा और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन से जुड़ा है। DNPA का कहना है कि पत्रकारिता में कई बार ऐसी जानकारियों का इस्तेमाल करना पड़ता है, जो सार्वजनिक हित से संबंधित होती हैं। इनमें सरकारी कामकाज, प्रशासनिक फैसलों, भ्रष्टाचार और अन्य महत्वपूर्ण मामलों की जांच शामिल हो सकती है।
संगठन के मुताबिक, यदि खबर प्रकाशित करने के लिए हर बार उस व्यक्ति की सहमति जरूरी हो जाए, जिससे संबंधित व्यक्तिगत डेटा का इस्तेमाल किया जा रहा है, तो खोजी पत्रकारिता में बाधाएं आ सकती हैं।
DNPA ने अपनी याचिका में तर्क दिया है कि कानून के कुछ प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिली बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकते हैं। संगठन ने सूचना के अधिकार और पत्रकारों के स्वतंत्र रूप से काम करने की क्षमता पर भी चिंता जताई है।
याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई है। इसके माध्यम से DNPA ने अदालत से उन कानूनी प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर विचार करने का अनुरोध किया है, जिन्हें वह पत्रकारिता के लिए बाधक मानता है।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें एक ओर लोगों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा का सवाल है, तो दूसरी ओर मीडिया के लिए सार्वजनिक हित से जुड़ी खबरों की पड़ताल और प्रकाशन की स्वतंत्रता का मुद्दा है।
DPDP एक्ट की किन धाराओं को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई?

DNPA ने अपनी याचिका में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट के कई प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, संगठन ने कानून की निम्नलिखित धाराओं को चुनौती दी है:
- धारा 7
- धारा 17(2)
- धारा 18
- धारा 19
- धारा 27
- धारा 29
- धारा 36
- धारा 37
- धारा 44(3)
इसके अलावा, DNPA ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स, 2025 के नियम 16, 17 और 23 को भी चुनौती दी है।
संगठन का कहना है कि इन प्रावधानों और नियमों का असर पत्रकारिता के कामकाज पर पड़ सकता है। विशेष रूप से ऐसी खबरों की रिपोर्टिंग में परेशानी हो सकती है, जिनमें सार्वजनिक हित के लिए व्यक्तिगत डेटा या संवेदनशील जानकारियों की पड़ताल करना जरूरी होता है।
याचिका में धारा 37(1) पर भी सवाल उठाए गए हैं। DNPA का तर्क है कि इस प्रावधान के तहत केंद्र सरकार को कुछ परिस्थितियों में जानकारी तक सार्वजनिक पहुंच रोकने का अधिकार मिल सकता है।
हालांकि, इन सभी प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर अभी अदालत का अंतिम निर्णय नहीं आया है। फिलहाल ये संगठन की ओर से उठाए गए कानूनी सवाल हैं, जिन पर केंद्र सरकार का जवाब और आगे की न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
‘न्यूजरूम बंद हो जाएंगे’, माधवी दीवान ने क्या दलील दी?

सुप्रीम कोर्ट में DNPA की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने कानून के संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई। उन्होंने दलील दी कि यह पारंपरिक मीडिया संस्थानों की ओर से इस मुद्दे पर दायर की गई एक महत्वपूर्ण याचिका है।
माधवी दीवान के मुताबिक, डेटा प्रोटेक्शन कानून के कुछ प्रावधान पत्रकारिता में खबरों के इस्तेमाल और प्रकाशन की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति से जुड़ी खबर प्रकाशित करने के लिए उसकी अनुमति लेनी पड़े, तो स्वतंत्र पत्रकारिता का उद्देश्य ही प्रभावित हो सकता है।
उन्होंने कहा कि खबर का नया होना पत्रकारिता की बुनियादी जरूरत है। यदि किसी सूचना के प्रकाशन से पहले संबंधित व्यक्ति की मंजूरी लेना अनिवार्य हो जाए, तो कई महत्वपूर्ण खबरें समय पर सामने नहीं आ पाएंगी।
दीवान ने अदालत में दलील दी कि इस तरह की व्यवस्था से न्यूजरूम के कामकाज पर गंभीर असर पड़ सकता है। खोजी पत्रकारिता में अक्सर ऐसी जानकारियां सामने आती हैं, जिन्हें सार्वजनिक करना जनहित में जरूरी माना जाता है, लेकिन संबंधित व्यक्ति स्वयं उन्हें सार्वजनिक करने की अनुमति नहीं देना चाहता।
DNPA की मांग है कि चुनौती दिए गए प्रावधानों पर रोक लगाई जाए, ताकि मामले की सुनवाई के दौरान पत्रकारिता के कामकाज पर संभावित असर को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सके।
खोजी पत्रकारिता और लाइव रिपोर्टिंग पर क्यों जताई गई चिंता?
Supreme Court DNPA : में DNPA ने विशेष रूप से खोजी पत्रकारिता और लाइव रिपोर्टिंग का मुद्दा उठाया है। खोजी पत्रकारिता के तहत पत्रकार किसी मामले की तह तक जाने के लिए दस्तावेजों, रिकॉर्ड, गवाहों और अन्य स्रोतों से जानकारी जुटाते हैं।
कई बार ऐसी खबरें सरकारी विभागों, सार्वजनिक संस्थानों या प्रभावशाली लोगों के कामकाज से जुड़ी होती हैं। यदि पत्रकारों को हर बार संबंधित व्यक्ति की सहमति पर निर्भर रहना पड़े, तो संगठन के अनुसार कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां सार्वजनिक करना मुश्किल हो सकता है।
लाइव रिपोर्टिंग में भी समय महत्वपूर्ण होता है। घटनास्थल से तुरंत जानकारी देना या किसी महत्वपूर्ण घटनाक्रम की रिपोर्टिंग करना पत्रकारों के काम का हिस्सा है। DNPA का तर्क है कि डेटा से जुड़े प्रावधानों की अस्पष्टता पत्रकारों के लिए कानूनी अनिश्चितता पैदा कर सकती है।
हालांकि, यह संगठन की ओर से व्यक्त की गई आशंका है। कानून के वास्तविक दायरे, उसके अपवादों और पत्रकारिता पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर अदालत में आगे होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी।
इस विवाद का केंद्र यह है कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए मीडिया को सार्वजनिक महत्व के मामलों की स्वतंत्र रिपोर्टिंग करने की पर्याप्त गुंजाइश कैसे मिले।
पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा पर भी सवाल
DNPA ने याचिका में पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई है। पत्रकारों को कई बार ऐसे लोगों से जानकारी मिलती है, जो अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं करना चाहते। कुछ मामलों में ये सूत्र सरकारी विभागों या संस्थानों के भीतर से महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराते हैं।
संगठन का आरोप है कि डेटा प्रोटेक्शन कानून के कुछ प्रावधानों का इस्तेमाल पत्रकारों के स्रोतों की पहचान उजागर करने के लिए किया जा सकता है। यदि सूचना देने वाले लोगों की पहचान सामने आने का खतरा बढ़ता है, तो वे महत्वपूर्ण जानकारी साझा करने से पीछे हट सकते हैं।
इसका असर उन खबरों पर पड़ सकता है, जिनमें किसी प्रशासनिक निर्णय, सरकारी व्यवस्था या सार्वजनिक हित से जुड़े मामले की पड़ताल की जाती है।
DNPA का मानना है कि पत्रकारों के स्रोतों की गोपनीयता स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए महत्वपूर्ण है। संगठन चाहता है कि कानून के प्रावधानों को इस तरह लागू किया जाए कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के नाम पर पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों को अनावश्यक जोखिम का सामना न करना पड़े।
हालांकि, इस मामले में कानून के संभावित दुरुपयोग को लेकर संगठन ने आशंका जताई है। पत्रकारों के सूत्रों की सुरक्षा पर इन प्रावधानों का वास्तविक प्रभाव क्या होगा, यह कानूनी व्याख्या और आगे की सुनवाई से स्पष्ट हो सकेगा।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि याचिकाकर्ता इस विषय के विशेषज्ञ हैं और वे केंद्र सरकार को ऐसे सुझाव दे सकते हैं, जिनसे पत्रकारिता की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि डेटा प्रोटेक्शन कानून को लागू करते समय लोगों के अधिकारों और मीडिया की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।
मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी का आशय यह था कि इस क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञ कानून के संभावित प्रभावों और उसके दुरुपयोग को रोकने के उपायों के बारे में बेहतर सुझाव दे सकते हैं।
अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार का पक्ष जानने के लिए नोटिस जारी किया है। अब केंद्र सरकार का जवाब और याचिका में उठाए गए सवालों पर आगे की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी।
इस स्तर पर अदालत ने कानून को असंवैधानिक घोषित नहीं किया है। याचिकाकर्ता की मांग और अदालत का अंतिम निर्णय अलग-अलग बातें हैं, इसलिए मामले की अगली कार्यवाही पर नजर रहेगी।
RTI एक्ट में किए गए संशोधन को भी चुनौती
DNPA ने डेटा प्रोटेक्शन कानून के अलावा सूचना का अधिकार यानी RTI एक्ट की धारा 8(1)(j) में किए गए संशोधन को भी चुनौती दी है।
संगठन का आरोप है कि इस बदलाव के कारण सरकारी अधिकारियों से संबंधित जानकारी हासिल करना मुश्किल हो सकता है। याचिका के मुताबिक, व्यक्तिगत जानकारी का हवाला देकर ऐसी सूचनाएं देने से इनकार किया जा सकता है, जिनका संबंध सार्वजनिक हित से हो।
सूचना का अधिकार कानून नागरिकों और पत्रकारों को सरकारी कामकाज से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने का माध्यम देता है। पत्रकारिता में RTI के जरिए मिले दस्तावेज कई बार खबरों की पड़ताल और तथ्यों की पुष्टि करने में मदद करते हैं।
DNPA की चिंता है कि संशोधित प्रावधानों की व्याख्या और इस्तेमाल से सार्वजनिक हित की जानकारी तक पहुंच प्रभावित हो सकती है। हालांकि, इस मुद्दे पर भी अंतिम कानूनी स्थिति अदालत के विचार और फैसले के बाद ही स्पष्ट होगी।
केंद्र सरकार को नोटिस, 17 नवंबर को अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने DNPA की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। यह कदम मामले में सरकार का पक्ष जानने की न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
याचिका में DNPA ने डेटा प्रोटेक्शन एक्ट की कुछ धाराओं और नियमों को असंवैधानिक घोषित करने के साथ चुनौती दिए गए प्रावधानों पर रोक लगाने की मांग की है। संगठन ने RTI एक्ट में किए गए संशोधन को लेकर भी सवाल उठाए हैं।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मामले में अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को निर्धारित है। उस सुनवाई में केंद्र सरकार के जवाब और पक्षकारों की दलीलों के आधार पर आगे की प्रक्रिया बढ़ सकती है।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि अदालत ने सरकार से जवाब मांगा है, लेकिन कानून के विवादित प्रावधानों पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।
DPDP एक्ट विवाद में आगे क्या होगा?
इस मामले का परिणाम डिजिटल मीडिया संस्थानों, खोजी पत्रकारों और व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा से जुड़े व्यापक सवालों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। DNPA चाहता है कि डेटा प्रोटेक्शन कानून के प्रावधानों की ऐसी व्याख्या हो, जिससे मीडिया की स्वतंत्रता और सार्वजनिक हित की रिपोर्टिंग प्रभावित न हो।
दूसरी ओर, व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण कानूनी उद्देश्य है। ऐसे में अदालत के सामने चुनौती यह होगी कि दोनों पक्षों के अधिकारों और हितों के बीच कानूनी संतुलन कैसे कायम किया जाए।
फिलहाल DNPA की याचिका में उठाए गए सवालों पर केंद्र सरकार का जवाब आना बाकी है। सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि चुनौती दिए गए प्रावधानों पर क्या कानूनी रुख अपनाया जाता है।
Supreme Court DNPA : अब मीडिया की स्वतंत्रता, गोपनीयता के अधिकार और सूचना तक सार्वजनिक पहुंच के बीच संतुलन से जुड़ा अहम मामला बन गया है। 17 नवंबर की अगली सुनवाई में इस विवाद से जुड़े कानूनी पहलुओं पर आगे की स्थिति सामने आने की उम्मीद है।
Supreme Court DNPA : यह खबर उपलब्ध रिपोर्ट के आधार पर तैयार की गई है। DNPA की दलीलें और आशंकाएं याचिकाकर्ता का पक्ष हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है; चुनौती दिए गए प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला आना बाकी है।