सरकारी योजनाओं में करोड़ों खर्च, फिर भी अधूरे काम! ठेकेदारों से होगी वसूली, कलेक्टर बोले– “अब क्या करें, जो हो गया सो हो गया”

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गरियाबंद जिले में आदिवासी विकास विभाग के माध्यम से कराए गए करोड़ों रुपये के सरकारी विकास कार्य अब जिला प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। स्कूल जतन योजना के तहत स्वीकृत निर्माण कार्य अधूरे पड़े हैं, स्कूलों में शौचालय निर्माण समय पर पूरा नहीं हो सका और स्वीकृत पदों से अधिक कर्मचारियों की नियुक्ति के कारण करोड़ों रुपये का वेतन बकाया हो गया है। इन मामलों को लेकर अब जिला प्रशासन जांच, वसूली और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी में जुट गया है। कलेक्टर भगवान सिंह उइके ने स्वयं स्वीकार किया है कि कई विकास कार्य अधूरे हैं और संबंधित ठेकेदारों से राशि वसूलने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

सबसे गंभीर मामला स्कूलों में शौचालय निर्माण का है। जिले के 116 स्कूलों में शौचालय निर्माण के लिए करीब एक करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई थी। निर्माण एजेंसी के रूप में आदिवासी विकास विभाग ने दुर्ग की कंचन कंस्ट्रक्शन को काम सौंपा और शुरुआत में ही करीब 61 लाख रुपये का अग्रिम भुगतान भी कर दिया। इस फैसले का स्थानीय स्तर पर विरोध हुआ था, क्योंकि जिले की पंचायतों और स्थानीय एजेंसियों को मौका नहीं दिया गया। उस समय ठेका देने में मिलीभगत के आरोप भी लगे थे।

करीब दस महीने बीत जाने के बावजूद स्थिति यह रही कि 116 में से केवल 23 शौचालयों का निर्माण ही पूरा हो सका। अधिकांश स्कूल आज भी अधूरे निर्माण कार्य की वजह से मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। अप्रैल में जिला प्रशासन ने निर्माण कार्य में लापरवाही को देखते हुए शेष राशि में से 36 लाख रुपये की वसूली के लिए संबंधित कंपनी को नोटिस जारी किया। हालांकि नोटिस के कई महीने बाद भी ठेका कंपनी की ओर से राशि जमा नहीं की गई है। जिला पंचायत निर्माण समिति के सभापति का आरोप है कि संबंधित ठेकेदार प्रभावशाली अधिकारियों के करीबी होने के कारण प्रशासन केवल नोटिस जारी करने तक सीमित रहा, जबकि नियमों के अनुसार कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने जैसी सख्त कार्रवाई भी की जा सकती थी।

दूसरा बड़ा मामला आदिवासी विकास विभाग की आश्रम-शालाओं में स्वीकृत पदों से अधिक कर्मचारियों की नियुक्ति का है। जिले की 79 आश्रम-शालाओं में केवल 255 चपरासी पद स्वीकृत थे, लेकिन मौखिक आदेशों के आधार पर कर्मचारियों की संख्या बढ़ाकर 513 तक पहुंचा दी गई। आरोप यह भी लगे कि कुछ नियुक्तियां दलालों के माध्यम से पैसे लेकर कराई गईं, जबकि कुछ नियुक्तियां जनप्रतिनिधियों की सिफारिश पर की गईं। शासन से केवल स्वीकृत पदों के अनुसार ही बजट मिलता रहा, जिसके कारण विभाग कर्मचारियों को नियमित वेतन देने में असमर्थ रहा और रोटेशन के आधार पर भुगतान किया जाता रहा।

स्थिति लगातार बिगड़ती गई और अंततः दिसंबर 2025 में अतिरिक्त कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। नौकरी जाने के बाद प्रभावित कर्मचारी लगातार धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं और अपने लंबित वेतन की मांग कर रहे हैं। मार्च 2026 में विभाग ने शासन को भेजे गए मांग पत्र में कर्मचारियों के लंबित वेतन के भुगतान के लिए 3.84 करोड़ रुपये की मांग की है। हाल ही में कर्मचारियों ने अनिश्चितकालीन आंदोलन की चेतावनी भी दी थी, जिसे प्रशासन के आश्वासन के बाद फिलहाल स्थगित कर दिया गया। सहायक आयुक्त लोकेश्वर पटेल का कहना है कि जब तक शासन से अतिरिक्त बजट का आबंटन नहीं होगा, तब तक भुगतान संभव नहीं है।

इन मामलों को लेकर जिला प्रशासन पर भी कई सवाल उठ रहे हैं। बिना कलेक्टर की मंजूरी के करोड़ों रुपये के निर्माण कार्यों का आवंटन संभव नहीं माना जाता, ऐसे में जिम्मेदारी तय करने की मांग तेज हो गई है। इस पर कलेक्टर भगवान सिंह उइके ने कहा कि कुछ कार्य उनके कार्यकाल से पहले स्वीकृत हुए थे, जबकि कुछ उनके कार्यकाल के दौरान हुए। उन्होंने इन गड़बड़ियों के लिए तत्कालीन सहायक आयुक्त नवीन भगत की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि पूरे मामले की विस्तृत जांच कराई जा रही है और रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जिन ठेकेदारों ने अधूरे काम छोड़े हैं, उनके खिलाफ अंतर राशि की वसूली की जाएगी। यदि आवश्यकता पड़ी तो दूसरे जिलों में राजस्व वसूली प्रमाणपत्र (आरआरसी) की कार्रवाई कर उनकी संपत्तियां कुर्क कर राशि वसूली जाएगी।

अब जो हो गया, सो हो गया : कलेक्टर भगवान सिंह उइके

जब कलेक्टर भगवान सिंह उइके से पूछा गया कि क्या इन मामलों में फैसले लेने के दौरान दूरदर्शिता की कमी रही, तो उन्होंने स्वीकार किया कि कई गड़बड़ियां हुई हैं। उनका कहना था, “अब जो हो गया, सो हो गया। हमारी प्राथमिकता सभी अधूरे कार्यों को पूरा कराना, सरकारी राशि की वसूली करना और दोषियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित करना है।”

गरियाबंद जिले में सामने आए ये मामले सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, प्रशासनिक निगरानी और वित्तीय जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि निर्माण कार्य अधूरे रह जाएं, कर्मचारियों की नियुक्तियां नियमों के विपरीत हों और सरकारी धन का सही उपयोग न हो सके, तो इसका सीधा नुकसान आम जनता और विद्यार्थियों को उठाना पड़ता है। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन की जांच और वसूली की कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रहती है या वास्तव में जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई कर सरकारी धन की भरपाई की जाती है।

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