बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट अनुकंपा नियुक्ति (Chhattisgarh HC On Compassionate Appointment) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सामने आया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी बेटी को केवल इस आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसकी शादी हो चुकी है। (Chhattisgarh HC On Compassionate Appointment) कोर्ट ने दो शादीशुदा बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति देने का रास्ता साफ करते हुए बैंक को निर्धारित नियमों के अनुसार नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने (Chhattisgarh HC On Compassionate Appointment) इस मामले में सिंगल बेंच के पहले दिए गए फैसले को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने दोनों अपीलकर्ताओं को उनकी शैक्षणिक योग्यता और लागू नियमों के आधार पर नियुक्ति देने के निर्देश दिए हैं।
क्या है अनुकंपा नियुक्ति का पूरा मामला?
(Chhattisgarh HC On Compassionate Appointment) मामला छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक के दो कर्मचारियों से जुड़ा है। बैंक के कर्मचारी मदन कुमार पांडा और शैलेन्द्र कुमार जॉन्सन की नौकरी के दौरान मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उनके परिवार की ओर से अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया गया।
मृत कर्मचारियों की शादीशुदा बेटियों अंकिता मिश्रा और शीना डेविड ने भी अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। हालांकि, बैंक ने उनके आवेदन स्वीकार नहीं किए। इसके बाद दोनों ने अपने नियुक्ति अधिकार को लेकर हाईकोर्ट का रुख किया।
(Chhattisgarh HC On Compassionate Appointment) इस मामले में सिंगल बेंच ने 7 मई 2026 को दोनों याचिकाएं खारिज कर दी थीं। इसके बाद दोनों आवेदकों की ओर से डिवीजन बेंच के समक्ष रिट अपील दाखिल की गई।
हाईकोर्ट ने बैंक के आदेश को किया रद्द
मामले की सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने बैंक के उस फैसले को स्वीकार नहीं किया, जिसमें बेटियों के विवाहित होने को अनुकंपा नियुक्ति के लिए अयोग्यता का आधार बनाया गया था।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट अनुकंपा नियुक्ति मामले में कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि अगर इसी योजना के तहत विवाहित बेटों को नियुक्ति का लाभ दिया जा सकता है, तो केवल शादीशुदा होने के कारण बेटियों को इससे बाहर रखना समानता के अधिकार के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने बैंक के दोनों रिजेक्शन आदेशों के साथ-साथ सिंगल बेंच के फैसले को भी निरस्त कर दिया।
शादी होने से माता-पिता पर निर्भरता खत्म नहीं होती
हाईकोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि किसी बेटी की शादी हो जाने मात्र से यह स्वतः नहीं माना जा सकता कि उसकी अपने माता-पिता के प्रति आर्थिक या सामाजिक निर्भरता पूरी तरह समाप्त हो गई है।
कोर्ट के अनुसार, अनुकंपा नियुक्ति के मामले में वास्तविक परिस्थितियों और संबंधित व्यक्ति की निर्भरता का आकलन किया जाना जरूरी है। केवल वैवाहिक स्थिति को आधार बनाकर किसी बेटी को नियुक्ति के अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता।
यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां विवाहित बेटियों की अनुकंपा नियुक्ति के दावों पर केवल उनकी शादी को आधार बनाकर सवाल उठाए जाते हैं।
बैंक को 90 दिन में नियुक्ति देने का निर्देश
डिवीजन बेंच ने बैंक को दोनों अपीलकर्ताओं की शैक्षणिक योग्यता और लागू नियमों के अनुसार 90 दिनों के भीतर अनुकंपा नियुक्ति देने का निर्देश दिया है।
इस तरह कोर्ट ने न केवल बैंक के नियुक्ति से जुड़े आदेशों को रद्द किया, बल्कि दोनों महिलाओं को नियमों के तहत नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल करने का रास्ता भी साफ कर दिया।
बेटियों के अधिकार को लेकर क्या संदेश?
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला अनुकंपा नियुक्ति में विवाहित बेटियों के अधिकार से जुड़े मामलों के लिहाज से अहम है। फैसले में यह स्पष्ट किया गया है कि केवल शादी हो जाना किसी बेटी को स्वतः अनुकंपा नियुक्ति के अधिकार से बाहर करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
हालांकि, नियुक्ति का लाभ संबंधित शैक्षणिक योग्यता, लागू नियमों और मामले की परिस्थितियों के आधार पर ही मिलेगा। यानी शादीशुदा होने के आधार पर सीधे अयोग्य घोषित करने के बजाय पात्रता और वास्तविक परिस्थितियों का मूल्यांकन किया जाना जरूरी होगा।
फिलहाल इस फैसले के बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामलों में विवाहित बेटियों के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टिकोण सामने आया है। बैंक को अब कोर्ट के निर्देश के मुताबिक दोनों अपीलकर्ताओं की पात्रता और नियमों के आधार पर नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।