भोपाल: मध्य प्रदेश में मंत्री विजय शाह के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है। कैबिनेट की ओर से अभियोजन की अनुमति नहीं देने के फैसले के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने सरकार के निर्णय पर सवाल उठाए हैं।
विवेक तन्खा का कहना है कि किसी वर्तमान या पूर्व मंत्री के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति के मामले में फैसला केवल राज्य सरकार की कैबिनेट के स्तर पर नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस संबंध में वर्ष 2003 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में राज्यपाल की भूमिका महत्वपूर्ण होती है और उन्हें अपने विवेक से निर्णय लेना चाहिए।
मंत्री जी के मामले में कैबिनेट की कुर्सियां तो एकजुट दिखीं, लेकिन अब सवाल संवैधानिक अधिकारों का खड़ा हो गया है। विजय शाह के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति पर कैबिनेट ने फैसला लिया, तो वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने ही सवाल उठा दिया कि आखिर मंत्री या पूर्व मंत्री के खिलाफ अभियोजन पर फैसला सरकार करेगी या राज्यपाल?
सवाल सिर्फ विजय शाह का नहीं है। सवाल उस पूरी व्यवस्था का है, जहां मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई की बात आते ही फाइलें, कानूनी राय और संवैधानिक अधिकार सब अचानक चर्चा में आ जाते हैं।
जनता के लिए कानून सीधा है गलती हुई तो कार्रवाई।
लेकिन सत्ता के गलियारों में पहुंचते ही मामला इतना सीधा क्यों नहीं रहता?
कैबिनेट में बैठे माननीयों से सवाल है अगर कानून सबके लिए बराबर है, तो मंत्री और आम नागरिक के मामले में प्रक्रिया को लेकर इतनी माथापच्ची क्यों?
आज फैसला विजय शाह का है, लेकिन कल सवाल किसी और मंत्री पर भी उठ सकता है। इसलिए मुद्दा किसी एक चेहरे का नहीं, बल्कि पूरे मंत्रिमंडल की जवाबदेही का है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि कैबिनेट का फैसला भारी पड़ता है, राज्यपाल का विवेक या फिर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी क्योंकि इस बार मामला सिर्फ कुर्सी का नहीं, संवैधानिक जिम्मेदारी का भी है।
कांग्रेस ने उठाए सवाल- क्या मंत्री के लिए अलग कानून है?
इस बीच मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने गर्वनर को पत्र लखकर दखल देने की मांग की है. उन्होंने सवाल उठाया है कि केवल मंत्री होने के कारण किसी आरोपी को बचाने के लिए जांच एजेंसी की मांग को कैसे रोका जा सकता है? कांग्रेस ने सवाल उठाया है कि क्या एक आम नागरिक और कैबिनेट मंत्री के लिए कानून अलग-अलग हैं?

सिंघार का आरोप है कि मोहन यादव सरकार, सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में बनी SIT की जांच रिपोर्ट के बावजूद शाह को बचाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने गवर्नर से कहा है कि वे सुनिश्चित करें कि मामले को निष्पक्षता से निपटाया जाए और मुकदमे की प्रक्रिया कानून के मुताबिक आगे बढ़े.
जीतू पटवारी ने राष्ट्रपति को लिखा पत्र
उधर, मध्य प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भी विजय शाह को राजनीतिक संरक्षण होने का आरोप लगाया है, जिसके लिए उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखा है. पटवारी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी ने अभियोजन की स्वीकृति की मांग की है. ऐसे में सरकार का रुख देश के सामने एक गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़ा करता है, क्या सत्ता में बैठे व्यक्ति कानून से ऊपर हैं?
विजय शाह मामले में कैबिनेट ने क्या फैसला लिया?
विजय शाह के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति के मामले में मध्य प्रदेश कैबिनेट ने SIT की रिपोर्ट और कानूनी राय पर चर्चा की। इसके बाद कैबिनेट ने उनके खिलाफ अभियोजन की अनुमति नहीं देने का फैसला किया।
अब इस निर्णय के बाद मामले में राज्यपाल की भूमिका अहम मानी जा रही है। सरकार की ओर से संबंधित प्रक्रिया के तहत मामला राज्यपाल के समक्ष भेजे जाने की बात सामने आई है।
वहीं, विवेक तन्खा ने इसी प्रक्रिया को लेकर कानूनी सवाल खड़े किए हैं। उनका तर्क है कि मंत्री या पूर्व मंत्री के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति के मामले में संवैधानिक प्रक्रिया के तहत राज्यपाल को निर्णय लेना चाहिए।

2003 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
विवेक तन्खा ने अपने बयान में 2003 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख किया है। उनके मुताबिक, ऐसे मामलों में जब किसी मंत्री या पूर्व मंत्री के खिलाफ अभियोजन की अनुमति का सवाल आता है, तो राज्यपाल अपने संवैधानिक अधिकार और विवेक के आधार पर फैसला कर सकते हैं।
इस बयान के बाद विजय शाह मामले में कानूनी पहलू एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि राज्यपाल इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं और आगे की संवैधानिक प्रक्रिया किस दिशा में जाती है।
31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
विजय शाह मामले में सुप्रीम कोर्ट में 31 अगस्त को सुनवाई प्रस्तावित है। ऐसे में राज्य सरकार के लिए भी यह मामला महत्वपूर्ण हो गया है।
सुनवाई के दौरान सरकार को SIT की रिपोर्ट और अभियोजन स्वीकृति से जुड़े कैबिनेट के फैसले के बारे में अदालत को जानकारी देनी पड़ सकती है। हालांकि, अंतिम स्थिति अदालत में होने वाली कार्यवाही और संबंधित पक्षों की दलीलों के बाद ही स्पष्ट होगी।
इस बीच राज्यपाल के संभावित निर्णय पर भी सबकी नजर बनी हुई है। यदि मामला राज्यपाल के समक्ष जाता है, तो उनके फैसले का आगे की कानूनी प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।
क्या है अभियोजन स्वीकृति का विवाद?
अभियोजन स्वीकृति का मुद्दा तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब किसी लोक सेवक या सार्वजनिक पद पर रहे व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाने के लिए संबंधित संवैधानिक या वैधानिक अनुमति की आवश्यकता होती है।
विजय शाह मामले में विवाद इसी बात को लेकर है कि अभियोजन की अनुमति देने या न देने का अधिकार किस संवैधानिक प्राधिकारी के पास है। सरकार ने SIT की रिपोर्ट और कानूनी राय के आधार पर अपना निर्णय लिया है, जबकि विवेक तन्खा ने इस प्रक्रिया में राज्यपाल की भूमिका को प्राथमिक बताया है।
यही वजह है कि अब यह मामला केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक और कानूनी बहस का विषय भी बन गया है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल मामले में तीन चीजों पर सबसे ज्यादा नजर रहेगी—राज्यपाल का फैसला, सुप्रीम कोर्ट की 31 अगस्त की सुनवाई और SIT रिपोर्ट को लेकर सरकार का पक्ष।
यदि राज्यपाल इस मामले में कोई निर्णय लेते हैं, तो उसके बाद कानूनी प्रक्रिया उसी के अनुरूप आगे बढ़ सकती है। वहीं सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में भी अभियोजन स्वीकृति और सरकार के फैसले से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल सामने आ सकते हैं।
विवेक तन्खा के बयान ने इस पूरे मामले में एक नया कानूनी कोण जोड़ दिया है। अब देखना होगा कि राज्यपाल और सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर इस मामले में आगे क्या रुख सामने आता है।