CEC Gyanesh Kumar SIR Controversy अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें Special Intensive Revision यानी SIR से जुड़े फैसलों और कथित अनियमितताओं की जांच की मांग की गई है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि SIR प्रक्रिया के दौरान ऐसे फैसले लिए गए, जिनमें चुनाव आयोग के अन्य सदस्यों की सहमति नहीं थी। याचिकाकर्ता ने इन फैसलों को गैर-कानूनी घोषित करने और पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है।
13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटने का दावा
याचिका में चुनावी मतदाता सूची के संशोधन के दौरान 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने के मुद्दे को भी उठाया गया है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि SIT गठित कर यह जांच की जाए कि इतने बड़े पैमाने पर मतदाता नामों को किस प्रक्रिया के तहत हटाया गया।
यह संख्या SIR के दौरान 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से हटाए गए नामों से जुड़ी मीडिया रिपोर्टों में भी सामने आई है। हालांकि, इन आंकड़ों को लेकर राजनीतिक दलों और चुनाव आयोग के बीच व्याख्या को लेकर मतभेद हैं।
याचिका में CEC के फैसलों पर उठाए गए सवाल

याचिका में हाल में सामने आई द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीने की अवधि में कम से कम 14 मौकों पर आयोग से जुड़े कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्तियां दर्ज की थीं। इनमें मतदाता नाम जोड़ने-हटाने, Form 6 और चुनावी डेटा के केंद्रीकरण जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।
याचिकाकर्ता ने इसी रिपोर्ट को आधार बनाते हुए सवाल उठाया है कि क्या ऐसे फैसले चुनाव आयोग की निर्धारित प्रक्रिया और अधिकार क्षेत्र के अनुरूप लिए गए थे।
फैसलों को गैर-कानूनी घोषित करने की मांग

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में मांग की गई है कि यदि कुछ फैसले अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए हैं तो उनकी वैधानिकता की जांच की जाए और ऐसे फैसलों को गैर-कानूनी घोषित किया जाए।
साथ ही, याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर अधिकारियों की भूमिका की जांच और जिम्मेदारी तय करने के लिए स्वतंत्र जांच की मांग की है।
चुनाव आयोग का क्या कहना है?
दूसरी ओर, चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारियों ने हालिया रिपोर्टों के बीच कहा है कि SIR से संबंधित कई आदेशों को CEC और दोनों चुनाव आयुक्तों ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी थी। इनमें Form 6 और Form 8 से जुड़े निर्देश तथा नागरिकता संबंधी घोषणा जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।
इसलिए SIR को लेकर सामने आए आरोपों और चुनाव आयोग के पक्ष के बीच अंतर को समझना महत्वपूर्ण है। याचिका में लगाए गए आरोप फिलहाल न्यायिक जांच के विषय हैं और उन्हें अदालत द्वारा स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
SIR को लेकर पहले से चल रहा विवाद
SIR को लेकर पिछले कुछ दिनों से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज है। चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों से जुड़ी रिपोर्ट सामने आने के बाद कई विपक्षी दलों ने CEC ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाए हैं और स्वतंत्र जांच की मांग की है।

इसी बीच महाराष्ट्र में भी CEC ज्ञानेश कुमार से जुड़े 14 प्रशासनिक आदेशों को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई हैं। इनमें SIR के दौरान हटाए गए मतदाताओं को बहाल करने और प्रक्रिया से जुड़े रिकॉर्ड सार्वजनिक करने जैसी मांगें शामिल हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट में आगे क्या होगा?
CEC Gyanesh Kumar SIR Controversy में दाखिल नई याचिका के बाद अब मामले की न्यायिक प्रक्रिया पर नजर रहेगी। याचिकाकर्ता की प्रमुख मांगों में SIR से जुड़े कथित अनियमित फैसलों की जांच, 13 करोड़ नाम हटाए जाने के दावे की SIT जांच और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल शामिल है।
फिलहाल यह स्पष्ट करना जरूरी है कि याचिका में लगाए गए आरोप और मांगी गई जांच अपने आप में किसी अधिकारी की आपराधिक जिम्मेदारी साबित नहीं करते। मामले में आगे सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही और अदालत की टिप्पणियों से ही इसकी कानूनी स्थिति स्पष्ट होगी।