नई दिल्ली:भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में हुई अभद्रता की घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि देश की संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और सम्मान बनाए रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने इस पूरे मामले पर संयमित और संतुलित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कई बार लोग भावनाओं में बहकर गलतियां कर बैठते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा को ठेस पहुंचाई जाए।
दरअसल, पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसने न्यायपालिका की गरिमा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। अदालत में स्वयं अपनी पैरवी कर रहे एक याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान अनुचित व्यवहार किया और अदालत की कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न किया। इतना ही नहीं, उसने अदालत के प्रति असम्मानजनक भाषा का भी प्रयोग किया, जिससे वहां मौजूद सभी लोग हैरान रह गए।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए आया था, जिसमें जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे शामिल थे। याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप स्वयं अदालत में अपना पक्ष रख रहे थे। सुनवाई के दौरान उन्होंने पहले अदालत को असामान्य तरीके से संबोधित किया और फिर न्यायाधीशों के प्रति भी अनुचित भाषा का इस्तेमाल किया।
रिपोर्टों के अनुसार, याचिकाकर्ता ने अदालत को संबोधित करते हुए ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जो न्यायालय की गरिमा के अनुरूप नहीं थे। इसके बाद उन्होंने अपनी सीट से उठकर बेंच की ओर कागजात फेंकने शुरू कर दिए। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें शांत कराने और अदालत कक्ष से बाहर ले जाने का प्रयास किया। इस दौरान उन्होंने देश के मुख्य न्यायाधीश के लिए भी अपमानजनक टिप्पणियां कीं।

CJI सूर्यकांत ने कहा ‘बच्चे कई बार ऐसा कर देते हैं’
सोमवार को एक कार्यक्रम के दौरान जब मीडिया ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत से इस घटना पर प्रतिक्रिया मांगी, तो उन्होंने बेहद संयमित शब्दों में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि कई बार लोग भावनात्मक परिस्थितियों में गलत व्यवहार कर बैठते हैं, लेकिन समाज के प्रत्येक नागरिक का यह दायित्व है कि वह संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करे।
उन्होंने कहा कि संविधान और उससे जुड़ी संस्थाएं लोकतंत्र की आधारशिला हैं। इसलिए इन संस्थाओं की मर्यादा और प्रतिष्ठा बनाए रखना केवल न्यायपालिका या सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का कर्तव्य है। CJI ने इस बात पर जोर दिया कि सभी लोगों को संस्थाओं के प्रति सम्मानजनक रवैया अपनाना चाहिए।
“अरे छोड़िए..बच्चे कई बार ऐसा कर देते हैं।”
अदालत ने दिखाई संवेदनशीलता
घटना के बावजूद सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने याचिकाकर्ता के खिलाफ तत्काल अवमानना की कार्रवाई शुरू नहीं की। अदालत ने यह माना कि संबंधित व्यक्ति मानसिक और भावनात्मक रूप से परेशान दिखाई दे रहा था। इसी कारण न्यायाधीशों ने उसके प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया।
हालांकि, अदालत ने मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों का अध्ययन करने के बाद उसकी याचिका को खारिज कर दिया। न्यायालय का मानना था कि याचिका में प्रस्तुत आरोपों और मांगों के समर्थन में पर्याप्त आधार उपलब्ध नहीं थे।
साइबर क्राइम से जुड़ा था मामला
याचिकाकर्ता का आरोप था कि एक निजी कंपनी कथित रूप से साइबर अपराधों के एक बड़े नेटवर्क का संचालन कर रही है। उसने संबंधित पुलिस अधिकारियों और कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। इसी विषय को लेकर वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था और स्वयं ही अपनी पैरवी कर रहा था।
हालांकि, अदालत ने पाया कि याचिका में लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त तथ्य और कानूनी आधार प्रस्तुत नहीं किए गए थे। परिणामस्वरूप याचिका को खारिज कर दिया गया।
लोकतंत्र में संस्थाओं का सम्मान आवश्यक
यह घटना एक बार फिर इस बात की याद दिलाती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका, संसद और अन्य संवैधानिक संस्थाओं का विशेष महत्व है। नागरिकों को अपनी बात रखने और न्याय पाने का पूरा अधिकार है, लेकिन इसके साथ ही संस्थाओं के प्रति सम्मान और शिष्टाचार बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की प्रतिक्रिया को कई लोग न्यायपालिका की गरिमा और सहिष्णुता का उदाहरण मान रहे हैं। उन्होंने विवाद को बढ़ाने के बजाय संस्थाओं के सम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी पर जोर दिया। उनका संदेश स्पष्ट है कि असहमति और आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा हो सकती है।