CJP नेताओं की रिहाई का रास्ता साफ हो गया है। दिल्ली की एक विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट अदालत ने बुधवार को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के प्रमुख नेताओं आशुतोष रांका और सौरभ दास को शर्तों के साथ रिहा करने का आदेश जारी कर दिया है। इन दोनों नेताओं को सात दिन पहले जंतर-मंतर पर बिना अनुमति प्रदर्शन करने और पुलिस कार्रवाई में बाधा डालने के आरोप में हिरासत में लिया गया था। दिल्ली हाई कोर्ट से अपनी याचिका वापस लेने के बाद मजिस्ट्रेट अदालत ने उन्हें यह राहत दी है।
दिल्ली की विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट अदालत ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रमुख नेताओं आशुतोष रांका और सौरभ दास को कुछ शर्तों के साथ रिहा करने का आदेश दिया। दोनों नेताओं को ₹50,000 के व्यक्तिगत बॉन्ड और इतनी ही राशि के जमानती बॉन्ड की प्रक्रिया पूरी करनी पड़ी। आदेश के बाद दोनों देर शाम तिहाड़ जेल से बाहर आए।
मजिस्ट्रेट अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 135(3) के तहत एहतियाती कदम उठाते हुए दोनों नेताओं की रिहाई के आदेश दिए।
दोनों नेताओं को करीब सात दिन पहले जंतर-मंतर पर कथित तौर पर बिना अनुमति प्रदर्शन करने और पुलिस के काम में बाधा डालने के आरोप में हिरासत में लिया गया था। यह मामला मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR में कथित गड़बड़ियों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग से जुड़ा है।
CJP नेताओं की रिहाई किन शर्तों पर हुई?

अदालत में जमा किए गए अपने लिखित हलफनामे में आशुतोष रांका और सौरभ दास ने न्यायपालिका के प्रति पूरा विश्वास जताया है। उन्होंने लिखित रूप में यह वचन दिया है कि जब तक जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए आधिकारिक मंजूरी नहीं मिलती, तब तक वे वहाँ किसी भी आंदोलन का आह्वान नहीं करेंगे। साथ ही, उन्होंने यह आश्वासन भी दिया है कि उनके द्वारा भविष्य में आयोजित किए जाने वाले सभी विरोध प्रदर्शन पूरी तरह से भारतीय संविधान के दायरे और मर्यादा में ही रहेंगे।
विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 135(3) के तहत एहतियाती कार्रवाई से जुड़े मामले में आशुतोष रांका और सौरभ दास को राहत दी। रिहाई के लिए दोनों को ₹50,000 का व्यक्तिगत बॉन्ड और उतनी ही राशि का जमानती बॉन्ड जमा करना पड़ा।
अदालत ने रिहाई के साथ कुछ शर्तें भी रखीं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, दोनों नेताओं को जांच पूरी होने तक सुनवाई की प्रत्येक तारीख पर अदालत में उपस्थित रहना होगा। इसके अलावा उन्हें शांति व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं।
इस फैसले के तहत रिहाई मिलने का मतलब यह नहीं है कि मामले की सभी कानूनी कार्यवाही समाप्त हो गई है। दोनों नेताओं को अदालत की ओर से तय शर्तों का पालन करना होगा और संबंधित कार्यवाही में सहयोग करना होगा।
अदालत में दोनों नेताओं ने क्या हलफनामा दिया?
अदालत में प्रस्तुत लिखित हलफनामे में आशुतोष रांका और सौरभ दास ने न्यायपालिका के प्रति विश्वास जताया। उन्होंने यह आश्वासन दिया कि जब तक जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की आधिकारिक अनुमति नहीं मिलती, तब तक वे वहां किसी आंदोलन का आह्वान नहीं करेंगे।
दोनों नेताओं ने यह भी कहा कि भविष्य में उनके द्वारा आयोजित किए जाने वाले विरोध प्रदर्शन भारतीय संविधान के दायरे और निर्धारित मर्यादाओं के भीतर होंगे। अदालत में दिया गया यह लिखित आश्वासन उनकी रिहाई की शर्तों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए अनुमति से जुड़ा मुद्दा इस मामले का प्रमुख हिस्सा है। किसी भी विरोध प्रदर्शन के लिए लागू नियमों और प्रशासनिक निर्देशों का पालन करना आयोजकों की जिम्मेदारी होती है। अदालत ने भी दोनों नेताओं से शांति बनाए रखने और सुनवाई में उपस्थित रहने की अपेक्षा की है।
13 अक्टूबर को क्या हुआ था?
इस मामले की शुरुआत 13 अक्टूबर को हुई थी। CJP नेताओं ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की थी।
इसी मांग को लेकर आशुतोष रांका और सौरभ दास अपनी पार्टी के 12 अन्य सदस्यों के साथ जंतर-मंतर पहुंचे थे। खबर के मुताबिक, उस स्थान पर प्रदर्शन के लिए आधिकारिक अनुमति नहीं थी। पुलिस ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों के काम में बाधा डाली गई।
इसके बाद दोनों नेताओं को हिरासत में लिया गया और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। मामले में पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शन की अनुमति को लेकर विवाद सामने आया।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि पुलिस की ओर से लगाए गए आरोप और अदालत में दिया गया पक्ष अलग-अलग कानूनी पहलू हैं। किसी आरोप को अंतिम रूप से सिद्ध मानने के लिए संबंधित न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध रिकॉर्ड को देखना आवश्यक है।
दिल्ली हाई कोर्ट से याचिका वापस लेने के बाद मिली राहत

रिहाई से पहले दोनों नेताओं ने दिल्ली हाई कोर्ट में दायर अपनी याचिका वापस ले ली थी। इसके बाद विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट अदालत ने उनके मामले में रिहाई का आदेश जारी किया।
अदालत के आदेश के बाद दोनों नेताओं को निर्धारित बॉन्ड और जमानती बॉन्ड की शर्तें पूरी करनी थीं। इसके साथ ही उन्हें भविष्य की सुनवाई में उपस्थित रहने और शांति व्यवस्था बनाए रखने के निर्देशों का पालन करना होगा।
इस घटनाक्रम से स्पष्ट है कि रिहाई के बावजूद मामला कानूनी प्रक्रिया के अधीन है। दोनों नेताओं के लिए अदालत की शर्तों का पालन करना आगे की कार्यवाही में महत्वपूर्ण रहेगा।
SIR और जंतर-मंतर प्रदर्शन को लेकर क्यों उठा विवाद?

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) मतदाता सूची की जांच और संशोधन से जुड़ी प्रक्रिया है। CJP नेताओं ने इसी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों का आरोप लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किया था और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग उठाई थी।
मतदाता सूची से जुड़े मुद्दे राजनीतिक और सार्वजनिक बहस का हिस्सा रहे हैं। ऐसे मामलों में राजनीतिक दल और संगठन अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते हैं, लेकिन प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान, अनुमति और कानून-व्यवस्था संबंधी नियमों का पालन भी जरूरी होता है।
जंतर-मंतर पर हुए इस घटनाक्रम में प्रदर्शन की अनुमति और पुलिस के काम में कथित बाधा मुख्य विवाद रहे। अब अदालत ने दोनों नेताओं को शर्तों के साथ रिहाई दी है। आगे की कानूनी प्रक्रिया में यह देखा जाएगा कि मामले से जुड़े आरोपों और अन्य तथ्यों पर क्या स्थिति बनती है।
CJP नेताओं की रिहाई के बाद आगे क्या?
आशुतोष रांका और सौरभ दास की रिहाई के बाद भी उन्हें अदालत के निर्देशों का पालन करना होगा। उन्हें सुनवाई की प्रत्येक निर्धारित तारीख पर उपस्थित रहना है और शांति व्यवस्था बनाए रखने की शर्त का पालन करना है।
दोनों नेताओं ने हलफनामे में जंतर-मंतर पर आधिकारिक अनुमति मिलने तक आंदोलन का आह्वान नहीं करने और भविष्य के विरोध प्रदर्शनों को संवैधानिक दायरे में रखने का आश्वासन दिया है।
फिलहाल इस मामले में सबसे अहम बातें हैं—₹50,000 का व्यक्तिगत बॉन्ड, समान राशि का जमानती बॉन्ड, अदालत में नियमित उपस्थिति और शांति बनाए रखने की शर्तें। CJP नेताओं की रिहाई से उन्हें राहत जरूर मिली है, लेकिन मामले की कानूनी प्रक्रिया अभी जारी रहेगी।