ये स्याही तेरे चेहरे पर नहीं, भारत माता के सम्मान पर उछाली गई है। जाहिल और संकीर्ण सोच वाले लोग भला कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं कि कोई बेटी पढ़े, आगे बढ़े, अपने हक़ की आवाज़ बुलंद करे और अन्याय के सामने डटकर खड़ी हो?
इन मवालियों की जमात तेरी हिम्मत, तेरे हौसले और तेरी बेबाकी को सहन नहीं कर पाई। यही वे लोग हैं जो विचारों का जवाब विचारों से देने के बजाय हिंसा और अपमान का सहारा लेते हैं। जो महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुँचाकर अपनी तथाकथित ताकत दिखाने की कोशिश करते हैं।
बिटिया, याद रखतू कोई साधारण बेटी नहीं है। तू वीरांगना है। तू रानी लक्ष्मीबाई का साहस है, रानी दुर्गावती का स्वाभिमान है, अहिल्याबाई होल्कर की मर्यादा है, रानी पद्मिनी का आत्मसम्मान है, मदर टेरेसा की करुणा है और इंदिरा गांधी का अदम्य नेतृत्व है।
स्याही के ये छींटे तेरी पहचान को धूमिल नहीं कर सकते। उल्टा, उन्होंने तेरे संघर्ष को और उजागर कर दिया है। तेरी आवाज़ अब सिर्फ़ तेरी नहीं रही-यह उन तमाम बेटियों की आवाज़ है जो सम्मान, शिक्षा, समानता और न्याय के लिए खड़ी हैं।
अन्याय के सामने झुकना नहीं, लेकिन अपने संघर्ष को संविधान, कानून और लोकतांत्रिक मूल्यों की ताकत से आगे बढ़ाना। क्योंकि असली बहादुरी किसी को जवाब देने में नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध डटे रहने में है।
हो सकता है कि मूर्खता और अत्याचार के ख़िलाफ़ यह लड़ाई लंबी हो, मगर यक़ीन रखो-फ़तह हमेशा सत्य, साहस और न्याय की होती है।