Patna Flood Alert: गंगा नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ बिहार की राजधानी पटना में बाढ़ का खतरा एक बार फिर चर्चा में है। गंगा के बढ़ते पानी के बीच शहर को बाढ़ से बचाने वाली करीब 50 साल पुरानी सुरक्षा दीवार एक बार फिर महत्वपूर्ण भूमिका में आ गई है। प्रशासन ने एहतियात के तौर पर सुरक्षा दीवार से जुड़े सभी 108 गेट बंद करा दिए हैं।
यह सुरक्षा व्यवस्था 1975 की विनाशकारी गंगा-सोन बाढ़ के बाद तैयार की गई थी। करीब पांच दशक बाद भी यही दीवार पटना के शहरी इलाकों को गंगा के बढ़ते पानी से बचाने वाली प्रमुख व्यवस्थाओं में शामिल है।
1975 की बाढ़ के बाद बनी थी सुरक्षा दीवार

पटना में गंगा के पानी से शहरी क्षेत्र को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से 1976 में सुरक्षा दीवार का निर्माण किया गया था। इसका मकसद था कि गंगा का पानी बढ़ने की स्थिति में वह सीधे रिहायशी इलाकों में प्रवेश न कर सके।
गंगा के दक्षिणी किनारे और शहर के बीच बनाई गई यह सुरक्षा पट्टी पश्चिम से पूर्व तक साढ़े आठ किलोमीटर से अधिक लंबी है। समय के साथ पटना का शहरी विस्तार काफी बढ़ गया, लेकिन बाढ़ से सुरक्षा के लिहाज से इस दीवार की उपयोगिता आज भी बनी हुई है।
गंगा का जलस्तर बढ़ते ही बंद किए गए 108 गेट
तीन सितंबर को गंगा के जलस्तर के उच्चतम बाढ़ स्तर के करीब पहुंचने के बाद प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था को सक्रिय किया। शहरी क्षेत्र में पानी के संभावित प्रवेश को रोकने के लिए सुरक्षा दीवार के 108 लोहे के गेट बंद कराने का आदेश दिया गया।
इसके साथ ही वर्षा और सीवरेज का पानी बाहर निकालने के लिए बनाए गए 13 स्लुइस गेट भी बंद कराए गए।
स्थिति का जायजा लेने के लिए जिलाधिकारी, एसएसपी और नगर आयुक्त ने दीघा घाट, बिंद टोली, एलसीटी घाट और गोसाईं टोला समेत सुरक्षा पट्टी के विभिन्न हिस्सों का निरीक्षण किया।
दानापुर से पटनासिटी तक सुरक्षा देती है दीवार
यह सुरक्षा दीवार पटना के कई महत्वपूर्ण गंगा तटीय क्षेत्रों को बाढ़ के पानी से बचाने का काम करती है। इसका विस्तार दानापुर से सटे नासरीगंज (रामजीचक) घाट, दीघा नहर क्षेत्र, दीघा घाट, गेट नंबर 55 से 93, बिंद टोली, एलसीटी घाट, गोसाईं टोला और गांधी घाट होते हुए पटनासिटी के पुराने गंगा किनारे तक बताया गया है।
जब गंगा का जलस्तर बाढ़ के उच्चतम स्तर की ओर बढ़ता है, तब गंगा की पेटी में रहने वाले लोगों के आवागमन के लिए बनाए गए गेटों को बंद कर दिया जाता है।
2019 में रिहायशी इलाकों में घुसा था बाढ़ का पानी
यह पहली बार नहीं है जब पटना की सुरक्षा दीवार को बाढ़ के दौरान सक्रिय किया गया हो। हालांकि, कुछ वर्षों में दीवार के बावजूद शहर के कुछ हिस्सों में बाढ़ का पानी पहुंचा है।
2016 में नासरीगंज (रामजीचक) घाट से दीघा नहर तक करीब 1.12 किलोमीटर क्षेत्र में लगभग छह करोड़ रुपये की लागत से कटावरोधी कार्य कराया गया था। इसका उद्देश्य सुरक्षा दीवार को मजबूत करना था।
वहीं 2019 में बाढ़ के दौरान दीघा, कुर्जी, मैनपुरा और राजापुर पुल के बीच गंगा की पेटी में बने भवनों के कारण पानी रिहायशी क्षेत्रों तक पहुंचने की स्थिति बनी थी। इसके बाद बाढ़ क्षेत्र में निर्माण और प्राकृतिक जलनिकासी को लेकर भी सवाल उठे।
जरूरत पड़ने पर दो मीटर तक बढ़ सकती है दीवार की ऊंचाई
गंगा-सोन बाढ़ प्रमंडल दीघा के कार्यपालक अभियंता शिशिर कुमार के मुताबिक, सुरक्षा दीवार की ऊंचाई 1975 में आई बाढ़ के उच्चतम स्तर से करीब 77 सेंटीमीटर अधिक है।
जरूरत पड़ने पर दीवार की ऊंचाई को लकड़ी के मजबूत पटरों यानी वुडन बोर्ड की मदद से करीब दो मीटर तक बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक तैयारी होने की बात कही गई है।
अधिकारी के अनुसार, फिलहाल सभी 108 गेट बंद किए जा रहे हैं और उपलब्ध व्यवस्था के आधार पर शहर में पानी प्रवेश करने की आशंका नहीं बताई गई है।
1976 से अब तक कई बार बनी सुरक्षा की पहली दीवार
पटना की यह सुरक्षा दीवार कई बार बाढ़ के दौरान महत्वपूर्ण साबित हुई है।
- 1975: गंगा-सोन की भीषण बाढ़ से पटना में भारी तबाही।
- 1976: बाढ़ से शहर को बचाने के लिए सुरक्षा दीवार का निर्माण।
- 2013: गंगा में बाढ़ के दौरान करीब 8.5 किलोमीटर दीवार के सभी गेट बंद किए गए।
- 2016: दीवार के एक हिस्से में कटावरोधी कार्य कराया गया।
- 2019: बाढ़ के दौरान कुछ रिहायशी इलाकों में पानी पहुंचा।
- 2020: एलसीटी घाट के गेट नंबर 55 को लेकर मॉक ड्रिल की गई।
- 2022-24: सुरक्षा दीवार के समानांतर करीब 20.5 किलोमीटर लंबा जेपी गंगा पथ विकसित हुआ।
सिर्फ नदी का उफान नहीं, बेतरतीब निर्माण भी बढ़ाता है बाढ़ का खतरा

पटना में बाढ़ और जलजमाव की समस्या को केवल गंगा के बढ़ते जलस्तर से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। शहर में तेजी से बढ़ता कंक्रीट निर्माण, प्राकृतिक जलनिकासी क्षेत्रों में कमी और नालों के प्रभावित होने से भी जलजमाव की समस्या बढ़ सकती है।
गंगा का जलस्तर बढ़ने पर शहर से बारिश और सीवरेज का पानी बाहर निकलने में भी परेशानी हो सकती है। ऐसे में कृत्रिम पंपिंग व्यवस्था के साथ-साथ प्राकृतिक जलनिकासी तंत्र को मजबूत रखना जरूरी माना जाता है।
बाढ़ क्षेत्र, वेटलैंड और प्राकृतिक जलनिकासी चैनलों को सुरक्षित रखने के साथ आहर-पइन जैसी पारंपरिक जलनिकासी प्रणालियों को दोबारा सक्रिय करने की जरूरत पर भी जोर दिया जाता रहा है।
50 साल पुरानी दीवार आज भी क्यों है जरूरी?

पटना की आधुनिक सड़कों, नए निर्माण और तेजी से फैलते शहरी क्षेत्र के बीच करीब पांच दशक पुरानी सुरक्षा दीवार आज भी बाढ़ प्रबंधन का अहम हिस्सा बनी हुई है।
Patna Flood Alert के बीच 108 गेटों को बंद करना इस बात को दिखाता है कि गंगा के बढ़ते जलस्तर के समय शहर की पुरानी बाढ़ सुरक्षा व्यवस्था आज भी कितनी महत्वपूर्ण है। हालांकि, भविष्य में पटना को बाढ़ और जलजमाव से बचाने के लिए केवल सुरक्षा दीवार ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक जलनिकासी, वेटलैंड संरक्षण और बाढ़ क्षेत्र में नियंत्रित निर्माण पर भी ध्यान देना जरूरी होगा।