Sawan Putrada Ekadashi Vrat Katha 2026: सावन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को सावन पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म में इस एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु की श्रद्धापूर्वक पूजा और व्रत करने से संतान से जुड़ी मनोकामनाओं के लिए श्रीहरि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
कई दंपति संतान के सुख, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना से इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यताओं में पुत्रदा एकादशी की कथा सुनने और पढ़ने को भी पुण्यदायी बताया गया है। मान्यता है कि कथा भक्तों को धर्म, भक्ति, संयम और श्रद्धा का संदेश देती है।
आइए जानते हैं सावन पुत्रदा एकादशी की संपूर्ण व्रत कथा।
सावन पुत्रदा एकादशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से सावन शुक्ल पक्ष की एकादशी के महत्व और व्रत विधि के बारे में पूछा। तब श्रीकृष्ण ने बताया कि सावन शुक्ल एकादशी को सावन पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को संतान सुख की कामना से किया जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने राजा महीजित की कथा सुनाते हुए बताया कि प्राचीन समय में महिष्मति नगर पर राजा महीजित का शासन था। राजा अपनी प्रजा का ध्यान रखते थे और धर्म-कर्म के कार्यों में भी लगे रहते थे। इसके बावजूद वे और उनकी पत्नी संतान न होने के कारण काफी दुखी थे।
राजा को पुत्र प्राप्ति की इच्छा थी। उन्होंने संतान सुख पाने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली।
संतान न होने से दुखी थे राजा महीजित
एक दिन राजा महीजित ने राजसभा बुलाई और अपनी पीड़ा मंत्रियों तथा प्रजा के सामने रखी। राजा ने कहा कि वह दान-पुण्य और धर्म के कार्य करता है, प्रजा के सुख-दुख में साथ खड़ा रहता है, फिर भी उसे संतान सुख क्यों नहीं मिल रहा है।
राजा की परेशानी सुनकर मंत्री और प्रजा भी चिंतित हो गए। उन्होंने राजा की समस्या का समाधान खोजने का निर्णय लिया और जंगलों में जाकर ऋषि-मुनियों से मार्गदर्शन लेने लगे।
इसी क्रम में वे लोमश ऋषि के पास पहुंचे और राजा के संतानहीन होने का कारण पूछा।
लोमश ऋषि ने बताया पूर्वजन्म का कारण
लोमश ऋषि ने अपने तप के बल पर राजा के पूर्वजन्म से जुड़ी घटना का पता लगाया। उन्होंने बताया कि पिछले जन्म में राजा एक निर्धन वैश्य थे। एक दिन भूख और प्यास से परेशान होकर वे एक तालाब के पास पहुंचे।
वहां एक गाय पानी पी रही थी। कथा के अनुसार, राजा ने गाय को वहां से हटा दिया और स्वयं तालाब का पानी पीने लगे। लोमश ऋषि ने बताया कि उसी कर्म के प्रभाव के कारण वर्तमान जन्म में राजा को संतान सुख नहीं मिल पा रहा है।
इसके बाद ऋषि ने राजा की समस्या के समाधान के लिए सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।
सावन पुत्रदा एकादशी व्रत से मिला राजा को संतान सुख
लोमश ऋषि ने कहा कि राजा को सावन शुक्ल एकादशी के दिन विधि-विधान से व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। इससे पूर्व कर्मों के प्रभाव से मुक्ति मिलेगी और संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिल सकता है।
ऋषि की बात सुनकर मंत्री और प्रजा प्रसन्न हुए और उनका आशीर्वाद लेकर नगर लौट आए।
इसके बाद सावन शुक्ल एकादशी के दिन मंत्री और प्रजा ने मिलकर सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा। भगवान विष्णु की पूजा की गई और रात्रि जागरण किया गया। अगले दिन स्नान और दान-पुण्य के बाद विधि के अनुसार व्रत का पारण किया गया।
कथा के अनुसार, मंत्री और प्रजा ने इस व्रत का पुण्य राजा महीजित को समर्पित कर दिया।
भगवान विष्णु की कृपा से राजा को मिला पुत्र
धार्मिक कथा के अनुसार, एकादशी व्रत के पुण्य प्रभाव से राजा महीजित के पूर्व कर्मों का प्रभाव समाप्त हुआ। इसके बाद उनकी पत्नी गर्भवती हुईं और समय आने पर उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया।
इस प्रकार राजा महीजित को संतान सुख प्राप्त हुआ। इसी कारण धार्मिक मान्यताओं में सावन पुत्रदा एकादशी को संतान सुख की कामना से किए जाने वाले महत्वपूर्ण व्रतों में माना जाता है।
धार्मिक मान्यता क्या कहती है?
मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से पुत्रदा एकादशी का व्रत करने तथा भगवान विष्णु की पूजा करने से भक्त को श्रीहरि की कृपा प्राप्त होती है। इस दिन व्रत कथा सुनने-पढ़ने का भी विशेष महत्व बताया गया है।