जांजगीर-चांपा: छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले में अकलतरा विकासखंड के ग्राम पंचायत कल्याणपुर स्थित पचपेड़िया निस्तारी तालाब को लेकर बड़ा मामला सामने आया है। सरकारी योजना के तहत विकसित इस तालाब में कथित तौर पर बड़ी मात्रा में फ्लाई ऐश यानी राखड़ डालकर उसके मूल स्वरूप को खत्म किए जाने के आरोप लगे हैं।
स्थानीय स्तर पर मामला उठने और शिकायतों के बाद अब इस मुद्दे को केंद्रीय स्तर तक ले जाया गया है। पर्यावरण मंत्रालय से स्वतंत्र जांच कराने और संबंधित एजेंसियों से पूरे मामले की वैज्ञानिक पड़ताल कराने की मांग की गई है।

मनरेगा से विकसित हुई थी सामुदायिक परिसंपत्ति
उपलब्ध मनरेगा एसेट रजिस्टर के अनुसार, वर्ष 2013-14 में पचपेड़िया तालाब के गहरीकरण और पचरी निर्माण का कार्य कराया गया था। रिकॉर्ड में इस कार्य की अनुमानित लागत करीब 9.19 लाख रुपये दर्ज है, जबकि 7,77,901.16 रुपये खर्च दिखाया गया है।
दस्तावेजों के अनुसार, इस कार्य से 4,016 मानव-दिवस रोजगार सृजित हुए और 694 लोगों को रोजगार मिलने का रिकॉर्ड दर्ज किया गया है।
इस आधार पर यह तालाब सरकारी योजना और सार्वजनिक धन से विकसित की गई एक सामुदायिक परिसंपत्ति के रूप में सामने आता है।
करीब 500 ट्रक राखड़ डालने का आरोप
मामले में आरोप है कि बाद के वर्षों में तालाब में बड़ी मात्रा में फ्लाई ऐश डाली गई। समाचार रिपोर्टों में करीब 500 ट्रक राखड़ तालाब में डाले जाने का उल्लेख किया गया है।
हालांकि, इस दावे और राखड़ की वास्तविक मात्रा की स्वतंत्र जांच होना बाकी है। इसी के साथ कई सवाल उठ रहे हैं कि इतनी बड़ी मात्रा में फ्लाई ऐश तालाब तक कैसे पहुंची और इसके परिवहन व निस्तारण की अनुमति किस स्तर पर दी गई।
अनुमति और प्रशासनिक कार्रवाई पर उठे सवाल
मामले को लेकर मांग की जा रही है कि संबंधित विभाग स्पष्ट करे कि सार्वजनिक उपयोग के तालाब में फ्लाई ऐश डालने की अनुमति दी गई थी या नहीं।
यदि अनुमति दी गई थी, तो यह स्पष्ट किया जाए कि वह किस नियम और प्रक्रिया के तहत दी गई। साथ ही यह भी जांच का विषय बताया जा रहा है कि संबंधित अधिकारियों ने स्थल निरीक्षण किया था या नहीं और फ्लाई ऐश के स्रोत की जांच की गई या नहीं।
स्थानीय स्तर पर शिकायतों और आरोपों के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं होने के आरोपों ने प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं।
केंद्रीय पर्यावरण एजेंसियों से स्वतंत्र जांच की मांग
मामले को लेकर केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय से स्वतंत्र जांच और कार्रवाई की मांग की गई है। मांग करने वालों का कहना है कि केंद्रीय पर्यावरणीय एजेंसियों की टीम मौके पर पहुंचकर निरीक्षण करे।
जांच के दौरान फ्लाई ऐश के नमूने लेकर मिट्टी और संभावित जल स्रोतों पर उसके प्रभाव का वैज्ञानिक परीक्षण कराने की मांग की गई है। इसके अलावा राखड़ के स्रोत, उसके परिवहन और निस्तारण से जुड़े दस्तावेजों की भी जांच की मांग उठाई गई है।
सिर्फ पर्यावरण नहीं, सार्वजनिक धन की जवाबदेही का भी मामला
यह विवाद केवल पर्यावरणीय प्रभाव तक सीमित नहीं है। मामला सरकारी धन से तैयार की गई सार्वजनिक परिसंपत्ति की सुरक्षा और उसके उपयोग से भी जुड़ा हुआ है।
यदि जांच में यह पुष्टि होती है कि मनरेगा के तहत विकसित तालाब को किसी अन्य या निजी उपयोग के लिए फ्लाई ऐश डालकर पाटा गया, तो संबंधित जिम्मेदारियों और अनुमति प्रक्रिया की जांच महत्वपूर्ण होगी।
अब राज्य स्तर पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं होने के आरोपों के बीच मामला केंद्र तक पहुंच गया है। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि पर्यावरण मंत्रालय और संबंधित केंद्रीय एजेंसियां शिकायत पर क्या कदम उठाती हैं और क्या वैज्ञानिक जांच के जरिए पचपेड़िया तालाब में कथित राखड़ भराव से जुड़े सवालों के जवाब सामने आते हैं।