इंदौर। मध्य प्रदेश के इंदौर में नौकरी दिलाने के नाम पर युवतियों को फंसाने का मामला अब और गंभीर होता जा रहा है। जिन आदिवासी युवतियों ने खुद को पीड़ित बताते हुए पुलिस से मदद मांगी थी, अब उन्हीं का आरोप है कि उन्हें न्याय मिलने के बजाय थाने से धक्के देकर बाहर निकाल दिया गया।
पीड़ित युवतियों का कहना है कि उन्हें अच्छी नौकरी और जल्दी पैसे कमाने का लालच देकर इंदौर बुलाया गया था। यहां आने के बाद उनसे पैसे लिए गए और उन्हें एक जगह पर रखा गया। उनका आरोप है कि उन्हें बाहर जाने की इजाजत नहीं थी और परिवार वालों से बात करने तक पर रोक लगा दी गई थी।
युवतियों का दावा है कि उन्हें शक होने लगा था कि उनकी तस्करी कर उन्हें दुबई भेजने की तैयारी की जा रही है। जैसे ही मौका मिला, वे वहां से निकल भागीं और किसी तरह अपने परिजनों तक पहुंचीं। इसके बाद उन्होंने पुलिस से मदद की गुहार लगाई।
हालांकि युवतियों का आरोप है कि जब वे शिकायत लेकर थाने पहुंचीं तो उनकी बात गंभीरता से नहीं सुनी गई। उनका कहना है कि थाना प्रभारी ने उनकी शिकायत दर्ज करने के बजाय उन्हें थाने से बाहर निकलवा दिया। अब वे पुलिस कमिश्नर कार्यालय पहुंचकर एफआईआर दर्ज करने और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रही हैं।
इस मामले में पुलिस के अलग-अलग बयानों ने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पहले एडिशनल डीसीपी सुमित केलकट्टा ने कहा था कि युवतियों को बंधक बनाए जाने की शिकायत मिली है और मामले की जांच की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा था कि जांच के बाद कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
लेकिन अगले ही दिन डीसीपी नरेंद्र रावत का बयान सामने आया, जिसमें उन्होंने कहा कि न तो किसी का अपहरण हुआ है और न ही पुलिस ने कोई छापा मारा है। उनके मुताबिक युवतियों से रात में एफआईआर दर्ज कराने के लिए कहा गया था, लेकिन वे शिकायत दर्ज कराए बिना ही वहां से चली गईं। पुलिस का यह भी कहना है कि मामला पैसों के लेन-देन से जुड़ा हुआ लग रहा है।
वहीं दूसरी ओर पीड़ित युवतियां अपने आरोपों पर कायम हैं। उनका कहना है कि वे किसी पैसों के विवाद की वजह से नहीं, बल्कि अपनी जान बचाने के लिए वहां से भागी थीं। उनका कहना है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और अगर मानव तस्करी या किसी अवैध नेटवर्क का खुलासा होता है तो दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। फिलहाल इस मामले में एक तरफ युवतियों के गंभीर आरोप हैं।