केंद्र सरकार ग्रामीण विकास मंत्रालय के माध्यम से वीबी-ग्राम-जी योजना को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसके लिए नियमों का मसौदा जारी किया गया है, जिसमें मजदूरी भुगतान, बेरोजगारी भत्ता, राज्यों को फंड आवंटन और योजना के क्रियान्वयन से जुड़े प्रावधान शामिल किए गए हैं। लेखक का दावा है कि इस योजना के लागू होने के साथ मनरेगा की जगह वीबी-ग्राम-जी ले लेगा।लेखक के अनुसार, वीबी-ग्राम-जी मनरेगा की तरह “काम का अधिकार” देने वाला कानून नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी रोजगार योजना है जिसमें सारी शक्तियां केंद्र सरकार के पास केंद्रित हैं। इसमें मजदूरों की मांग के अनुसार रोजगार उपलब्ध कराने की कानूनी बाध्यता नहीं रखी गई है।लेख में कहा गया है कि मनरेगा की सबसे बड़ी विशेषता मांग आधारित रोजगार गारंटी थी, जबकि वीबी-ग्राम-जी में इसे फंड आधारित व्यवस्था में बदल दिया गया है। लेखक का आरोप है कि इससे मजदूरों के अधिकार कमजोर होंगे और रोजगार की उपलब्धता सरकार द्वारा तय किए गए बजट पर निर्भर हो जाएगी।नियम 396 (ई) के तहत राज्यों को फंड देने का आधार 16वें वित्त आयोग के मानकों को बनाया गया है। लेखक का कहना है कि वित्त आयोग का फार्मूला राज्यों के आर्थिक और जनसंख्या संबंधी मापदंडों पर आधारित होता है, जबकि रोजगार गारंटी योजना में फंड का आधार मजदूरों द्वारा काम की वास्तविक मांग होनी चाहिए।लेख में तर्क दिया गया है कि यदि फंड आबादी और आर्थिक मानकों के आधार पर बांटा जाएगा, तो ऐसे राज्यों को नुकसान हो सकता है जहां कम आबादी होने के बावजूद रोजगार की मांग अधिक है। उदाहरण के तौर पर केरल का उल्लेख किया गया है, जहां मनरेगा के तहत राष्ट्रीय औसत से अधिक कार्य दिवस सृजित किए जाते रहे हैं।

प्रस्तावित नियमों में दूसरे वर्ष से फंड का एक हिस्सा राज्यों के प्रदर्शन के आधार पर देने की बात कही गई है। इसमें समय पर मजदूरी भुगतान, सामाजिक लेखापरीक्षा, कार्यों की पूर्णता और अन्य प्रदर्शन संकेतकों को आधार बनाया जाएगा। लेखक का कहना है कि इन मानकों का मजदूरों की वास्तविक जरूरतों और रोजगार की मांग से कोई सीधा संबंध नहीं है।लेख के अनुसार, राज्यों के बीच फंड वितरण की पूरी प्रक्रिया केंद्र सरकार के नियंत्रण में होगी। इसमें राज्यों की भूमिका सीमित रहेगी, जिससे राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है और केंद्र पर उनकी निर्भरता बढ़ सकती है।वीबी-ग्राम-जी में प्रत्येक परिवार को 125 दिनों का रोजगार देने के दावे पर भी लेखक ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि प्रस्तावित बजट और उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण यह दर्शाता है कि अधिकांश राज्यों में इतने कार्य दिवस उपलब्ध कराना संभव नहीं होगा।उदाहरण के तौर पर हरियाणा का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि प्रस्तावित फंड के आधार पर वहां प्रत्येक सक्रिय जॉब कार्ड धारक को केवल लगभग 23 दिनों का रोजगार ही उपलब्ध कराया जा सकेगा, जबकि दावा 125 दिनों का किया गया है।लेख में यह भी कहा गया है कि वर्ष 2025 और 2026 के शुरुआती महीनों की तुलना करने पर अधिकांश राज्यों में रोजगार सृजन में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।
उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, आंध्र प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में कार्य दिवसों में बड़ी कमी बताई गई है।प्रस्तावित नियमों के तहत राष्ट्रीय संचालन समिति के गठन का प्रावधान किया गया है। लेखक के अनुसार यह समिति पूरी तरह केंद्रीकृत होगी और इसमें राज्यों का प्रतिनिधित्व बहुत सीमित रहेगा। समिति के पास फंड आवंटन, दिशा-निर्देश, निगरानी और तकनीकी ढांचे से जुड़े महत्वपूर्ण अधिकार होंगे।लेख में कहा गया है कि समिति में केंद्र सरकार का प्रभाव अधिक रहेगा, जबकि राज्यों की भागीदारी अपेक्षाकृत कम होगी, जबकि राज्यों को योजना की लागत का 40 प्रतिशत वहन करना होगा।लेखक ने यह भी उल्लेख किया है कि इस समिति में मजदूर संगठनों, सामाजिक न्याय, महिला एवं जनजातीय मामलों से जुड़े मंत्रालयों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रखा गया है। इससे प्रभावित वर्गों की आवाज निर्णय प्रक्रिया में शामिल नहीं हो पाएगी।केंद्रीय परिषद के गठन का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें गैर-सरकारी सदस्यों और विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों को शामिल करने की बात कही गई है। हालांकि लेखक का कहना है कि इस परिषद के पास केवल सिफारिश करने का अधिकार होगा, निर्णय लेने का नहीं।नियम 4(3) के अनुसार यदि कोई राज्य अपने निर्धारित फंड से अधिक खर्च करता है, तो अतिरिक्त राशि राज्य सरकार को स्वयं वहन करनी होगी। लेखक का कहना है कि इससे वे राज्य दंडित होंगे जो मजदूरों की अधिक मांग के अनुसार रोजगार उपलब्ध कराने का प्रयास करेंगे।लेख में ई-केवाईसी को अनिवार्य बनाए जाने पर भी चिंता जताई गई है। लेखक के अनुसार बड़ी संख्या में मजदूर तकनीकी कारणों, आधार संबंधी त्रुटियों या अन्य समस्याओं के कारण ई-केवाईसी पूरी नहीं कर पाए हैं। ऐसे में उनके जॉब कार्ड अमान्य हो सकते हैं और वे रोजगार के अधिकार से वंचित हो सकते हैं।लेख में यह भी बताया गया है कि शिकायतों के निवारण के लिए राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर लोकपाल की व्यवस्था का प्रस्ताव रखा गया है। साथ ही सामाजिक लेखापरीक्षा को मजबूत और स्वतंत्र संस्था के माध्यम से संचालित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।अंत में लेखक का निष्कर्ष है कि वीबी-ग्राम-जी के प्रस्तावित नियम मनरेगा जैसे अधिकार-आधारित कानून की जगह एक सीमित, केंद्रीकृत और आवंटन आधारित व्यवस्था को बढ़ावा देते हैं। लेखक के अनुसार इसमें मजदूरों की मांग, राज्यों की भागीदारी और सामाजिक जवाबदेही की तुलना में केंद्र सरकार की भूमिका अधिक प्रभावशाली दिखाई देती है। उनका कहना है कि ऐसे समय में जब ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी और आर्थिक चुनौतियां बढ़ रही हैं, रोजगार गारंटी व्यवस्था को कमजोर करना करोड़ों ग्रामीण मजदूरों और गरीब परिवारों के हितों के विपरीत होगा।