Bhilai Charoda Municipal Election: नगर पालिक निगम भिलाई-चरोदा में चुनावी बिगुल बजने से पहले ही राजनीतिक सरगर्मी चरम पर पहुंच गई है। प्रमुख दलों द्वारा अधिकृत प्रत्याशियों की घोषणा अभी बाकी है, लेकिन संभावित दावेदारों ने मैदान पकड़ लिया है। स्थिति यह है कि कई वार्डों में एक ही दल के दो-दो दावेदार मतदाताओं के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं। त्योहारी मौसम का लाभ उठाते हुए कोई घर-घर मिठाई और उपहार बांट रहा है, तो कोई मुख्य चौराहों पर बड़े-बड़े होर्डिंग व पोस्टर लगाकर शक्ति प्रदर्शन कर रहा है। बिना टिकट शुरू हुई इस जमीनी होड़ ने भाजपा और कांग्रेस दोनों ही खेमों में आंतरिक खींचतान और गुटबाजी तेज कर दी है।
40 वार्डों में 72 हजार मतदाता- निगम के कुल 40 वार्डों में 72,247 मतदाता (35,172 पुरुष और 36,074 महिला) हैं। महिला मतदाताओं को देखते उन्हें साधने पर विशेष जोर है। विश्लेषकों का मानना है कि टिकट वितरण में विलंब होगा, अंतर्कलह उतनी ही बढ़ेगी।
भिलाई-चरोदा नगर निगम चुनाव से पहले ही भाजपा और कांग्रेस के भीतर टिकट को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। नगर निगम के 40 वार्डों में कई जगह एक ही पार्टी से दो-दो दावेदार सामने आ रहे हैं। अधिकृत प्रत्याशियों की घोषणा अभी बाकी है, लेकिन संभावित उम्मीदवारों ने अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए जनसंपर्क और प्रचार शुरू कर दिया है। वहीं, महापौर पद के लिए सामाजिक और जातीय समीकरण दोनों प्रमुख दलों के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं।
चुनाव की औपचारिक घोषणा और टिकट वितरण से पहले ही जिस तरह दावेदार सक्रिय हैं, उससे साफ है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए उम्मीदवारों का चयन आसान नहीं होने वाला। एक ओर नेता मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं, तो दूसरी ओर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सामने टिकट हासिल करने के लिए लॉबिंग का दौर चल रहा है।
40 वार्डों में 72,247 मतदाता, महिला वोटरों पर भी नजर

महापौर पद के लिए दो प्रमुख समाजों की दावेदारी सबसे मजबूत बनकर उभरी है। दोनों ही दलों के सामने सामाजिक संतुलन साधने की कड़ी चुनौती है। पार्टी नेतृत्व दावेदारों के व्यक्तिगत प्रभाव के साथ-साथ यह भी देख रहा है कि जिले के अन्य नगरीय निकायों में किस वर्ग को प्रतिनिधित्व मिला है। इस जटिल जातीय समीकरण के कारण सर्वसम्मत नाम तय करना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
भिलाई-चरोदा नगर निगम में कुल 40 वार्ड हैं। यहां 72,247 मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। इनमें 35,172 पुरुष और 36,074 महिला मतदाता शामिल हैं। मतदाता सूची के इन आंकड़ों को देखते हुए राजनीतिक दलों और संभावित प्रत्याशियों की नजर महिला मतदाताओं पर भी टिकी हुई है।
चुनाव से पहले ही दावेदार अपने-अपने वार्डों में लोगों से संपर्क बढ़ा रहे हैं। त्योहारों के दौरान जनसंपर्क का मौका भुनाने की कोशिश भी दिखाई दे रही है। कुछ संभावित उम्मीदवार घर-घर पहुंचकर मिठाई और उपहार बांट रहे हैं, जबकि कुछ ने प्रमुख चौराहों और सार्वजनिक स्थानों पर बड़े होर्डिंग और पोस्टर लगाकर अपनी मौजूदगी दर्ज करानी शुरू कर दी है।
इस गतिविधि को टिकट मिलने से पहले ही चुनावी तैयारी और शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, पार्टी की ओर से अधिकृत उम्मीदवार घोषित नहीं किए जाने के कारण दावेदारों के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है।
महापौर पद पर जातीय समीकरण बना बड़ी चुनौती

महापौर और पार्षद पद के दावेदार आला नेताओं के चक्कर काट रहे हैं। भाजपा के संभावित प्रत्याशी क्षेत्रीय विधायक, सांसद और संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों के सामने अपनी दावेदारी और सक्रियता पेश कर रहे हैं। वहीं, कांग्रेस खेमे के दावेदार पूर्व मुख्यमंत्री और संगठन के रणनीतिकारों के समक्ष लॉबिंग में जुटे हैं।
Bhilai Charoda Municipal Election में महापौर पद के उम्मीदवार का चयन भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए अहम रहने वाला है। इस पद के लिए दो प्रमुख समाजों की दावेदारी मजबूत बताई जा रही है। ऐसे में दोनों दलों के सामने ऐसा चेहरा चुनने की चुनौती है, जिससे सामाजिक संतुलन भी बना रहे और चुनावी जीत की संभावनाएं भी मजबूत हों।
पार्टी नेतृत्व केवल दावेदार की व्यक्तिगत लोकप्रियता या राजनीतिक सक्रियता के आधार पर फैसला नहीं कर सकता। उसे आसपास के क्षेत्रों और जिले के दूसरे नगरीय निकायों में मिले प्रतिनिधित्व को भी ध्यान में रखना पड़ सकता है। यही वजह है कि महापौर पद के लिए नाम तय करने में सामाजिक समीकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
जातीय और सामाजिक संतुलन के बीच किसी एक नाम पर सहमति बनाना दोनों दलों के लिए आसान नहीं दिख रहा है। यदि किसी दावेदार को टिकट मिलता है, तो दूसरे दावेदारों और उनके समर्थकों को साथ बनाए रखना भी पार्टी नेतृत्व के लिए बड़ी जिम्मेदारी होगी।
टिकट के लिए नेताओं के दरबार में पहुंच रहे दावेदार

पार्षद और महापौर पद के संभावित प्रत्याशी अपनी दावेदारी को मजबूत करने के लिए वरिष्ठ नेताओं से संपर्क साध रहे हैं। भाजपा में दावेदार क्षेत्रीय विधायक, सांसद और संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों के सामने अपनी सक्रियता और जनाधार का हवाला दे रहे हैं। टिकट के लिए संगठन में अपनी पकड़ और स्थानीय स्तर पर किए गए कामों को भी प्रमुखता से रखा जा रहा है।
वार्डों में पार्षद पद को लेकर अंदरूनी घमासान सबसे तीखा है। एक ही वार्ड से दो सक्रिय नेताओं के खुलकर सामने आने से पार्टियों को टिकट कटने के बाद बगावत का डर सता रहा है। यदि नाराज दावेदार निर्दलीय ताल ठोकते हैं, तो अधिकृत उम्मीदवार के जीत के समीकरण बिगडऩा तय है।
वहीं, कांग्रेस खेमे में भी टिकट की दौड़ कम नहीं है। पार्टी के संभावित उम्मीदवार पूर्व मुख्यमंत्री और संगठन के रणनीतिकारों तक अपनी बात पहुंचाने में जुटे हैं। दोनों दलों में दावेदारों की सक्रियता से साफ है कि टिकट वितरण से पहले ही अंदरूनी राजनीतिक समीकरण बनने और बिगड़ने लगे हैं।
पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि स्थानीय स्तर पर मजबूत दावेदार को मौका देते हुए संगठन के भीतर एकजुटता कैसे बनाए रखी जाए। टिकट की दौड़ में शामिल नेताओं के समर्थक भी अपने-अपने उम्मीदवार के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
एक वार्ड में दो दावेदार, टिकट कटने पर बगावत का खतरा
नगर निगम के वार्डों में पार्षद पद के टिकट को लेकर सबसे ज्यादा खींचतान दिखाई दे रही है। कई वार्डों में एक ही पार्टी से दो सक्रिय नेता अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। ऐसे में पार्टी के सामने यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि किसे चुनावी मैदान में उतारा जाए।
टिकट वितरण के बाद असंतोष सामने आने की आशंका भी बनी हुई है। यदि किसी मजबूत दावेदार का टिकट कटता है, तो उसके निर्दलीय चुनाव लड़ने या भीतर ही भीतर अधिकृत प्रत्याशी का विरोध करने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार को अपने ही खेमे से चुनौती मिल सकती है।
राजनीतिक दलों के लिए यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है, क्योंकि स्थानीय निकाय चुनाव में वार्ड स्तर का जनसंपर्क और व्यक्तिगत समीकरण काफी अहम माने जाते हैं। बागी उम्मीदवार मैदान में उतरते हैं, तो वोटों का बंटवारा अधिकृत प्रत्याशी के चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है।
टिकट की घोषणा में देरी बढ़ा सकती है मुश्किल
Bhilai Charoda Municipal Election से पहले भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने दावेदारों को संतुष्ट करने और सही उम्मीदवार चुनने की चुनौती है। टिकट की घोषणा में देरी होने पर दावेदारों के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है। वहीं, समय रहते फैसला नहीं होने पर गुटबाजी और असंतोष को संभालना भी मुश्किल हो सकता है।
दोनों प्रमुख दलों के उम्मीदवार चयन पर टिकी है। देखना होगा कि भाजपा और कांग्रेस महापौर पद पर किस सामाजिक समीकरण को प्राथमिकता देती हैं और 40 वार्डों में टिकट वितरण के दौरान किसे मौका मिलता है। फिलहाल भिलाई-चरोदा में चुनावी मुकाबले से पहले ही टिकट की जंग ने राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया है।