छत्तीसगढ़ के हसदेव जंगल में नई कोयला खदान को मंज़ूरी.. घने जंगलों को काटा जाएगा

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छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य इलाके में घने और मध्यम घने जंगलों के 1,742.6 हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग 4.48 लाख पेड़ों की कटाई की अनुमति दी गई है. सरकार के अपने ‘डिसीजन सपोर्ट सिस्टम’ टूल में इस क्षेत्र को ‘हाई कंज़र्वेशन ज़ोन’ यानी उच्च संरक्षण क्षेत्र की श्रेणी में रखा है. हसदेव के जंगलों में यह तीसरी बड़ी कोयला खदान है जिसे मंज़ूरी मिली है.

राजस्थान सरकार की स्वामित्व वाली बिजली उत्पादन कंपनी राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरवीयूएनएल) को छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले स्थित हसदेव अरण्य वन क्षेत्र में 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि को डायवर्ट करने की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी गई है. सरकार के अपने ‘डिसीजन सपोर्ट सिस्टम’ टूल में इस क्षेत्र को ‘हाई कंज़र्वेशन ज़ोन’ यानी उच्च संरक्षण क्षेत्र की श्रेणी में रखा है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, घने और मध्यम घने जंगलों के इस बड़े हिस्से में लगभग 4.48 लाख पेड़ों की कटाई की अनुमति दी गई है. हालांकि मंजूरी इस शर्त के साथ दी गई है कि पेड़ों की कटाई और खनन दोनों चरणबद्ध तरीके से किए जाएंगे.आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक (केईसीबी) में खनन का काम अडानी समूह करेगा, जो इस परियोजना का डेवलपर और ऑपरेटर है. यहां से निकला कोयला राजस्थान के छबड़ा और सूरतगढ़ ताप बिजली संयंत्रों को आपूर्ति किया जाएगा. आरवीयूएनएल को यह कोयला ब्लॉक अक्टूबर 2015 में उसके छबड़ा और सूरतगढ़ कोयला प्लांट में कोयले के अपने इस्तेमाल (कैप्टिव यूज़) के लिए दिया गया था.

हसदेव के जंगलों में यह तीसरा बड़ा कोयला खदान है जिसे मंजूरी मिली है. इससे पहले परसा कोल ब्लॉक (पीसीबी) और परसा ईस्ट केंते बासन (पीईकेबी) ओपन-कास्ट खदानें पहले से संचालित हैं. कभी इस क्षेत्र को ‘नो-गो ज़ोन’ यानी खनन निषिद्ध क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया था.

डायरेक्टर जनरल (वन) की अध्यक्षता वाली वन सलाहकार समिति (एफएसी) ने 8 मई की बैठक में आरवीयूएनएल के प्रस्ताव का मूल्यांकन करने के बाद इसे सैद्धांतिक या स्टेज-I मंजूरी दी.यह मंजूरी ऐसे समय में दी गई है जब आदिवासी समूह लगातार इसका विरोध कर रहे हैं और कई नागरिक संगठनों ने भी जैव-विविधता से समृद्ध इस जंगल में एक और बड़े कोयला ब्लॉक को खोलने के खिलाफ एफएसी को ज्ञापन भेजे थे.

एफएसी ने निर्देश दिया कि माइनिंग दो चरणों में की जाएगी. पहले चरण में, जो 15 साल तक चलेगा, माइनिंग सिर्फ़ 1001.95 हेक्टेयर वन भूमि तक ही सीमित रहेगी. दूसरे चरण में बाकी बचे 740.65 हेक्टेयर के लिए माइनिंग की अनुमति, पहले चरण में किए गए वनीकरण और जैव विविधता प्रबंधन से जुड़ी होगी.’पेड़ों की कटाई भी चरणों में की जाएगी.

पहले पांच सालों में 97,837 पेड़ काटे जाएंगे; दूसरे चरण में यानी कि छठे से दसवें साल के बीच, 59,712 पेड़ काटे जाएंगे. छत्तीसगढ़ सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह यह सुनिश्चित करे कि पेड़ों की कटाई सख़्ती से चरणबद्ध तरीके से ही हो और 60 सेंटीमीटर से कम मोटाई वाले 67,414 पेड़ों को दूसरी जगह लगाया जाए.

जंगलों के नुकसान की भरपाई के लिए, राज्य वन विभाग ने 3,233.3 हेक्टेयर खराब हो चुकी वन भूमि पर क्षतिपूरक वनीकरण का प्रस्ताव दिया है; इसमें से 636 हेक्टेयर ‘ऑरेंज फ़ॉरेस्ट’ है, जिसे रिकॉर्ड में जंगल के तौर पर नोटिफ़ाई नहीं किया गया है. मंत्रालय ने पहले यह बताया था कि 1,054 हेक्टेयर क्षतिपूरक वनीकरण भूमि मध्यम रूप से घने जंगल वाली थी.

राज्य सरकार ने 1,217 हेक्टेयर ज़मीन का एक और टुकड़ा चिहिन्त किया है, जिसमें से 1,086 हेक्टेयर ज़मीन पेड़ लगाने के लिए सही पाई गई.

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