Chhattisgarh High Court Bribery Case में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार के मामले में सिर्फ आरोपी के पास से रिश्वत के लिए इस्तेमाल किए गए नोट बरामद होना दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने रिश्वत की मांग की थी और उसे स्वीकार भी किया था।
न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने 18 सितंबर 2026 को सूरजपुर जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के अकाउंटेंट मुरली प्रसाद चौधरी की अपील पर फैसला सुनाया। अदालत ने 2017 में विशेष अदालत द्वारा दी गई सजा को रद्द करते हुए उन्हें रिश्वत के आरोपों से बरी कर दिया।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में रिश्वत की मांग को भ्रष्टाचार के अपराध का मूल आधार माना। अदालत के अनुसार, जब तक अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग को संदेह से परे साबित नहीं करता, तब तक केवल आरोपी के पास से दागी या रिश्वत के नोटों की बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
अदालत ने यह भी पाया कि इस मामले में अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग और स्वीकृति से जुड़ी बुनियादी आवश्यकता को साबित करने में सफल नहीं रहा।
क्या था पूरा मामला?

यह मामला साल 2014 का है। अभियोजन के मुताबिक, सूरजपुर में मां सरस्वती शिक्षा समिति द्वारा संचालित एक स्कूल की मान्यता से जुड़े काम के लिए समिति के अध्यक्ष एवं प्रबंधक मोहित राम राजवाड़े जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय पहुंचे थे।
अभियोजन का आरोप था कि वहां पदस्थ अकाउंटेंट मुरली प्रसाद चौधरी ने स्कूल की मान्यता के एवज में 15 हजार रुपये की रिश्वत मांगी थी। बाद में कथित तौर पर रकम कम होकर 8 हजार रुपये तय हुई।
शिकायत के बाद एंटी करप्शन ब्यूरो ने कार्रवाई की। अभियोजन के अनुसार, ट्रैप के दौरान आरोपी के पास से रिश्वत की रकम बरामद हुई थी। नोटों पर केमिकल टेस्ट भी कराया गया था।
ट्रायल के दौरान बदल गई मामले की तस्वीर
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन की कहानी को बड़ा झटका तब लगा, जब शिकायतकर्ता ने खुद रिश्वत मांगने की बात का समर्थन नहीं किया।
एक अन्य गवाह ने भी अदालत के सामने बयान दिया कि शिकायतकर्ता ने कथित तौर पर पैसे आरोपी की जेब में जबरन डाल दिए थे। हाईकोर्ट ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि अभियोजन के किसी भी गवाह ने रिश्वत मांगने के मुख्य आरोप की पुष्टि नहीं की।
ऐसे में केवल जेब से रकम बरामद होने को रिश्वत की मांग और स्वीकार करने का निर्णायक प्रमाण नहीं माना गया।
इलेक्ट्रॉनिक सबूतों पर भी उठे सवाल
Chhattisgarh High Court Bribery Case में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी अदालत के सामने महत्वपूर्ण मुद्दा रहा।
अभियोजन ने कथित रिश्वत मांग को साबित करने के लिए ऑडियो रिकॉर्डिंग पर भरोसा किया था। लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि रिकॉर्डिंग से संबंधित जरूरी कानूनी औपचारिकताएं पूरी नहीं की गई थीं।
अदालत के अनुसार, जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि रिकॉर्डिंग के संबंध में भारतीय साक्ष्य कानून की धारा 65-B के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र नहीं लिया गया था। इसके अलावा आरोपी की आवाज का नमूना भी नहीं लिया गया और रिकॉर्डिंग में मौजूद आवाज की फोरेंसिक पुष्टि भी नहीं कराई गई।
2017 में विशेष अदालत ने सुनाई थी सजा
मामले में सूरजपुर की विशेष अदालत ने 30 मार्च 2017 को मुरली प्रसाद चौधरी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराया था।
उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, विशेष अदालत ने धारा 7 के तहत तीन साल के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा तथा धारा 13(1)(d) सहपठित धारा 13(2) के तहत चार साल के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी। दोनों सजाएं साथ-साथ चलने का आदेश दिया गया था।
इसके खिलाफ अकाउंटेंट ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी।
हाईकोर्ट ने सजा रद्द कर किया बरी

अपील पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने विशेष अदालत के 2017 के फैसले को रद्द कर दिया और आरोपी को सभी संबंधित रिश्वतखोरी के आरोपों से बरी कर दिया।
अदालत के फैसले का मुख्य आधार यह रहा कि रिश्वत की मांग साबित किए बिना केवल रकम की बरामदगी दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकती। साथ ही, मामले में शिकायतकर्ता और गवाहों के बयानों तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों में मौजूद कमियों को भी अदालत ने महत्वपूर्ण माना।
फैसले का क्या है महत्व?
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े मामलों में ‘डिमांड’ यानी रिश्वत की मांग साबित करने की कानूनी आवश्यकता को रेखांकित करता है।
इस मामले में अदालत ने यह नहीं कहा कि रिश्वत की रकम की बरामदगी महत्वहीन है, बल्कि यह स्पष्ट किया कि अकेली बरामदगी तब तक दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती, जब तक अभियोजन के पास रिश्वत की मांग और स्वीकार किए जाने को साबित करने वाले विश्वसनीय साक्ष्य न हों।
इस तरह करीब एक दशक पुराने Chhattisgarh High Court Bribery Case में हाईकोर्ट ने 2017 की सजा को पलटते हुए शिक्षा विभाग के अकाउंटेंट को राहत दी है।